
-दलित-आदिवासी वोट बैंक पर फिर फोकस कर रही कांग्रेस
-देवेंद्र यादव-

क्या कांग्रेस 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में “मिशन 89” और 2029 के लोकसभा चुनाव में “मिशन 131” की रणनीति पर काम कर रही है? मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए यह सवाल लगातार चर्चा में है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा में दलितों के लिए 85 सीटें और आदिवासियों के लिए 4 सीटें आरक्षित हैं। वहीं लोकसभा की 543 सीटों में से 84 सीटें अनुसूचित जाति और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। ऐसे में यदि कांग्रेस उत्तर प्रदेश में दलित-आदिवासी वर्ग के बीच मजबूत पकड़ बना लेती है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव में उसका प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर भी दिखाई दे सकता है।
कांग्रेस की पारंपरिक ताकत रही है बहुजन राजनीति
दलित और आदिवासी वोट बैंक कभी कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत हुआ करते थे। लेकिन समय के साथ कांग्रेस को इन वर्गों में लगातार नुकसान उठाना पड़ा। यही वजह रही कि कांग्रेस धीरे-धीरे राज्यों और केंद्र की सत्ता से दूर होती चली गई।
इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी रहा कि विभिन्न राज्यों में दलित और आदिवासी नेताओं ने कांग्रेस से अलग होकर अपने-अपने क्षेत्रीय दल बना लिए। इन क्षेत्रीय दलों के उभार ने कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक को कमजोर कर दिया और सीटों में भी भारी गिरावट आई।
“आरक्षण बचाओ, संविधान बचाओ” अभियान से मिला लाभ
2024 के लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी और कांग्रेस ने “आरक्षण बचाओ, संविधान बचाओ” के नारे के साथ बहुजन राजनीति को केंद्र में रखा। इसका असर भी दिखाई दिया। कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में 6 लोकसभा सीटें और देशभर में कुल 99 सीटें मिलीं।
बहुजन राजनीति का अर्थ केवल दलित और आदिवासी ही नहीं, बल्कि पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय भी हैं। यदि कांग्रेस इसी सामाजिक समीकरण को केंद्र में रखकर 2027 और 2029 के चुनाव में आगे बढ़ती है, तो उसे राजनीतिक लाभ मिल सकता है।
राजेंद्र गौतम पर कांग्रेस का बड़ा दांव
कांग्रेस ने बहुजन राजनीति को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। पार्टी अध्यक्ष Mallikarjun Kharge के नेतृत्व में कांग्रेस ने बहुजन नेतृत्व को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है।
इसी रणनीति के तहत राहुल गांधी ने Rajendra Pal Gautam को कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर बड़ी जिम्मेदारी दी है। राजेंद्र गौतम को बहुजन समाज का प्रभावशाली रणनीतिकार माना जाता है और वे उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को नई राजनीतिक जमीन दिलाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
यदि कांग्रेस 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में उल्लेखनीय सफलता हासिल करती है, तो 2029 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी की स्थिति 2024 की तुलना में अधिक मजबूत हो सकती है।
ओबीसी राजनीति में भी बड़े चेहरे की जरूरत
कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती ओबीसी वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करना है। इसके लिए राहुल गांधी को किसी प्रभावशाली ओबीसी रणनीतिकार या बड़े नेता को आगे लाना होगा।
मौजूदा समय में Pappu Yadav एक ऐसा चेहरा माने जा रहे हैं, जो ओबीसी वर्ग के साथ-साथ युवाओं और छात्रों के बीच भी लोकप्रिय हैं। खासकर दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय के युवाओं में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है।
असम में पप्पू यादव ने कांग्रेस के एक युवा प्रत्याशी के समर्थन में प्रचार किया था और कांग्रेस उस सीट पर जीत दर्ज करने में सफल रही थी। इससे यह संकेत मिलता है कि वे चुनावी माहौल बनाने की क्षमता रखते हैं।
यूपी मिशन में बन सकती है नई जोड़ी
यदि कांग्रेस 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को गंभीरता से लड़ना चाहती है, तो उसे अभी से मजबूत सामाजिक और राजनीतिक गठजोड़ तैयार करने होंगे।
ऐसी स्थिति में राजेंद्र गौतम और पप्पू यादव की जोड़ी कांग्रेस के लिए प्रभावी साबित हो सकती है। दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक मतदाताओं को साथ लाकर कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर सकती है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व “मिशन 89” और “मिशन 131” को केवल राजनीतिक चर्चा तक सीमित रखते हैं या इसे जमीन पर उतारने के लिए व्यापक रणनीति तैयार करते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















