
ग़ज़ल
शकूर अनवर
लाख पोशीदा* रख रंजो-अलम* का पहलू।
कर दिया ऑंख ने ज़ाहिर* वही ग़म का पहलू।।
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अब तेरे पास बनावट के सिवा कुछ भी नहीं।
है तेरे लुत्फ़ ओ करम में भी सितम* का पहलू।।
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नज़रे सानी* भी कर लीजिए अशआर पे आप।
वर्ना शेरों में निकल आता है ज़म* का पहलू।।
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जबकि दुनिया किसी पहलू भी मेरे साथ नहीं।
ये मेरे पास ग़नीमत है क़लम का पहलू।।
चैन मिलता ही नहीं हमको कहीं भी “अनवर”।
याद आता है उसी शोख़* सनम का पहलू।।
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पोशीदा*छुपा हुआ
रंजो-अलम*दुख पीड़ा
ज़ाहिर*प्रकट
लुत्फ ओ करम*कृपाऍं मेहरबानियाॅं
सितम*ज़ुल्म, अत्याचार
नज़रे सानी* दुबारा देखना
ज़म*बुराई, फूहड़, मज़ाक,
शोख़ सनम*चंचल प्रेमिका
शकूर अनवर
9460851271

















