
कहो तो कह दूं…
-बृजेश विजयवर्गीय-

विश्व पर्यटन दिवस की बधाई के साथ ही यहां यह प्रासंगिक होगा कि पर्यटन विकास में क्या-क्या प्रमुख बाधाएं आ रही है। पहली बात तो पर्यटन है क्या ! विदेशी चोंचले है या सिर्फ घूमना ,फिरना और कलात्मक इमारत को निहारना प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेना। यह पर्यटन है तो यह मान के चलिए कि आने वाले समय में पर्यटन विकास बहुत तेजी से बाधित होने वाला है। ऐसा भी नहीं है कि सरकारें पर्यटन क्षेत्र को बढ़ाने के लिए कुछ नहीं कर रहीं। सच यह है कि सरकारें भी बहुत कुछ कर रही है ,लेकिन इसमें व्यापक समग्र दृष्टिकोण से कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। यह बहुत प्रासंगिक लगता है कि हम अपने आसपास के जंगलों को खत्म कर दूसरी जगह के जंगलों में मौज मस्ती के लिए चले जाएं और फिर कहें कि विदेश में यह अच्छा ह,ै वह अच्छा है। यह देखने जाए,ं वह देखने जाएं आदि जुमले हास्यास्पद हो जाते हैं।
राजस्थान समेत भारत के लगभग सभी शहरों में जिस प्रकार से पर्यावरण बिगड़ रहा है और जलवायु परिवर्तन का संकट सबके सामने खड़ा है उसे न केवल खाद्यान्न संकट ,पीने के पानी का संकट और यहां तक की शुद्ध हवा का भी संकट खड़ा हो गया है। ऐसे में पर्यटन विकास पर व्यापक दृष्टि से सोचने की आवश्यकता है। पर्यटन से भरपूर भारत में जहां ऐतिहासिक विरासत स्थल, जैव विविधता से परिपूर्ण वन संपदा, अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि क्षेत्र अपने में बहुत बड़ा पर्यटन विकास की गारंटी वाला धुआं रहित उद्योग है।
पर्यटन विकास से अर्थव्यवस्था को संबल मिलता है। यह बात तो समझ में आती है लेकिन जब पर्यावरण बिगड़ा है तो उसका पर्यटन पर भी दुष्प्रभाव पढ़ना स्वाभाविक है। बढ़ता तापमान और खराब मौसम पर्यटन के बहुत बड़े दुश्मन के रूप में सामने आ रहे हैं। जिस प्रकार की स्थितियां उत्तराखंड और पर्वतीय क्षेत्रों में बन रही है वहां पर विकास के नाम से प्राकृतिक संसाधनों के साथ भयंकर खिलवाड़ हो रहा है और पहाड़ों के खिसकने, तापमान बढ़ने, ग्लेशियर पिघलने से पर्यटन विकास की सभी संभावनाओं पर पानी फिरता नजर आ रहा है। जल और वायु का प्रदूषण किस प्रकार से पर्यटन को बढ़ा सकते हैं इस पर विचार की बहुत आवश्यकता है। हमने बढ़ते शहरीकरण और नियोजित विकास के चलते शहरों को रहने लायक नहीं छोड़ा। आने जाने के साधनों के विकास के साथ ही प्राकृतिक संपदा से भरपूर स्थान पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं। शहरों की चकाचौंध से ऊब कर जब लोग प्राकृतिक सौंदर्य का आनंद लेने पहाड़ों पर पहुंचते हैं तो वहां पर जो गंदगी का आलम देखने को मिल रहा है उससे लगता है कि यह उच्छृंखल पर्यटक प्रकृति को कितना नुकसान पहुंचा रहे हैं। जिस प्रकार वन्य जीव अभयारण्य में वन्य जीवों को निहारने का आनंद लेने के लिए और नियंत्रित पर्यटकों की गाड़ियां टाइगर रिजर्व और नेशनल पार्क में घूम रही हैं उससे वन्यजीवों पर भी दुष्प्रभाव पड़ रहा है। संरक्षित वन क्षेत्र में और नियंत्रित पर्यटन से वन्यजीवों की आदतों और उनकी दैनिक चर्या पर भी दुष्प्रभाव दृष्टिगोचर हो रहे हैं। शहरों में आनियंत्रित भीड़ जब थोड़ी सी वर्षा हो या सुहावना मौसम हो तो जंगलों और पहाड़ों की ओर सैर करने के लिए निकल जाती है। इसी के साथ प्राकृतिक सौंदर्य वाले स्थलों का पर्यटन विकास के नाम पर जबरदस्त शोषण होने लगा है। इन सबसे बचने के लिए आवश्यक है कि हमें हमारे पर्यटन स्थलों को और अधिक आकर्षक और सुरक्षित बनाने की जरूरत है। पहाड़ी क्षेत्र से आ रही डरावनी भूस्खलन की खबरें सामान्य व्यक्ति को भी विचलित करने के लिए पर्याप्त हैं। राजस्थान जैसे गर्म प्रदेश में जिस प्रकार से जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों का दोहन हो रहा है उससे आने वाले समय में और अधिक तापमान बढ़ने की आशंका है। इस कारण पर्यटन विकास पर दुष्प्रभाव प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। जिस प्रकार हमारी जीवन दायिनी नदियों और तालाबों को प्रदूषित करने का खेल चल रहा है उससे तो पर्यटन विकास ही क्या मनुष्य का संपूर्ण विकास संकट में आने वाला है। इन सब पर गौर करें तो समझ में आता है कि इन सब की जड़ में दूषित शिक्षा प्रणाली भी है जो प्रकृति के शोषण का पाठ पढ़ा रही है। आज जब हम पर्यटन विकास की बात कर रहे हैं तो विचार आता है कि क्यों ना कृषि क्षेत्र को भी पर्यटन की दृष्टि से विकसित किया जाए। इससे पर्यटन भी बढ़ेगा और कृषि क्षेत्र में अन्न उत्पादन के साथ ही रोजगार के अवसर भी बढ़ेगे।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं सदस्य विश्व जन आयोग बाढ़ .सुखाड़ हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















