
जब तक कांग्रेस दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग में सोशल इंजीनियरिंग करते हुए छोटी जातियों के नेताओं को संगठन में स्थान नहीं देगी, और उन्हें पंचायत से लेकर लोकसभा तक टिकट नहीं देगी, तब तक उसका पारंपरिक वोट वापस आना मुश्किल है।
-देवेन्द्र यादव-

कांग्रेस से उसका पारंपरिक वोट, दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग क्यों खिसका, और भारतीय जनता पार्टी सोशल इंजीनियरिंग के जरिए केंद्र की सत्ता पर कैसे काबिज हुई, यदि इसका राजनीतिक विश्लेषण करें तो यह स्पष्ट होता है कि भाजपा ने दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग की उन छोटी-छोटी जातियों को राजनीतिक महत्व दिया, जिन पर कांग्रेस ने या तो ध्यान नहीं दिया या पर्याप्त ध्यान नहीं दिया।
जनसंघ के समय से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नजर दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग की इन जातियों पर रही। संघ ने इन वर्गों के लोगों को संगठन में पद दिए और विधानसभा व लोकसभा में प्रत्याशी बनाकर उन्हें नेतृत्व के अवसर दिए। 2014 में इसका परिणाम सामने आया, जब भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और कई राज्यों में भी सत्ता हासिल की।
इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि भाजपा अब दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के साथ-साथ अल्पसंख्यक मुस्लिम मतदाताओं में भी राजनीतिक सेंध लगाने की कोशिश कर रही है। खासतौर पर पसमांदा मुसलमानों को अपने पक्ष में लाने का प्रयास किया जा रहा है। जैसे भाजपा ने छोटी जातियों को साथ जोड़ा, उसी तरह वह अपने आधार को और विस्तार देने की रणनीति पर काम कर रही है।
भाजपा ने अपने संगठन में छोटी-छोटी जातियों के नेताओं को पद देकर सम्मान दिया। साथ ही उन्हें पंचायत राज संस्थाओं, निकायों, विधानसभा और लोकसभा में उम्मीदवार बनाकर राजनीतिक हिस्सेदारी दी। इसका परिणाम यह हुआ कि पार्टी का आधार मजबूत होता गया। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार इसके बड़े उदाहरण हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश में भाजपा लगातार सत्ता में है, जबकि बिहार में वह मजबूत स्थिति में बनी हुई है।
दूसरी ओर, कांग्रेस देशभर में खुद को मजबूत करने के लिए संगठन सृजन अभियान चला रही है। कई राज्यों में जिला अध्यक्षों की नियुक्ति भी की गई है। लेकिन सवाल यह है कि जैसा राहुल गांधी पिछड़े वर्ग को उनकी आबादी के अनुसार हिस्सेदारी देने की बात करते हैं, क्या वैसी हिस्सेदारी संगठन में दिखाई देती है?
कांग्रेस के भीतर अब भी बड़ी जातियों के नेताओं का दबदबा बना हुआ है, जो लंबे समय से महत्वपूर्ण पदों पर हैं। जबकि अब छोटी-छोटी जातियों के लोग राजनीतिक रूप से जागरूक और संगठित हो चुके हैं। भाजपा के रणनीतिकार इस बदलाव को समझ चुके हैं, लेकिन कांग्रेस अभी भी इसे पूरी तरह समझ नहीं पाई है।
भाजपा ने इसी रणनीति के तहत कई राज्यों में कांग्रेस को सत्ता से बाहर किया है। कांग्रेस और उसके नेता अब भी यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि उसका पारंपरिक वोट बैंक कैसे खिसक गया।
अगर कांग्रेस के पिछड़ा वर्ग संगठन की बात करें, तो लंबे समय से राष्ट्रीय अध्यक्ष एक ही प्रमुख जाति से आते रहे हैं। कई राज्यों में भी नेतृत्व बड़ी जातियों के पास है। जबकि पिछड़े वर्ग की छोटी-छोटी जातियों में भी मजबूत और प्रभावशाली नेता मौजूद हैं, लेकिन वे उपेक्षा का शिकार हैं।
उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में बघेल समाज का अच्छा प्रभाव है। इसके बावजूद कांग्रेस ने इस समाज के नेताओं को न राष्ट्रीय स्तर पर और न ही राज्य स्तर पर पर्याप्त जिम्मेदारी दी है। खासकर मध्य प्रदेश में इस वर्ग को संगठन में प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए।
जब तक कांग्रेस दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग में सोशल इंजीनियरिंग करते हुए छोटी जातियों के नेताओं को संगठन में स्थान नहीं देगी, और उन्हें पंचायत से लेकर लोकसभा तक टिकट नहीं देगी, तब तक उसका पारंपरिक वोट वापस आना मुश्किल है। छोटी जातियों पर भाजपा का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है, क्योंकि भाजपा इन वर्गों के नेताओं को आगे बढ़ाकर उन्हें बड़ा राजनीतिक चेहरा बनाती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

















