दलित मुख्यमंत्री पर सियासत, आरोप और हकीकत के बीच सच्चाई क्या है?

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“कांग्रेस ने कभी दलित मुख्यमंत्री नहीं बनाया” यह दावा तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। लेकिन राजनीति में तथ्य से ज्यादा नैरेटिव (कहानी) मायने रखता है। भाजपा इस मुद्दे को उठाकर कांग्रेस को घेरना चाहती है, वहीं कांग्रेस इसे अपने पक्ष में सामाजिक न्याय के बड़े एजेंडे के रूप में पेश कर रही है।

-देवेन्द्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

राजनीति में बयानबाजी नई बात नहीं है। हर चुनाव से पहले ऐसे मुद्दे सामने आते हैं जो सीधे लोगों की भावनाओं से जुड़े होते हैं। इन दिनों ऐसा ही एक मुद्दा चर्चा में है। निशिकांत दुबे ने कहा कि कांग्रेस ने कभी किसी दलित नेता को मुख्यमंत्री नहीं बनाया। इस बयान के बाद बहस तेज हो गई है।

अगर सीधा जवाब देखें तो यह बात पूरी तरह सही नहीं है। कांग्रेस ने अलग अलग समय पर दलित नेताओं को मुख्यमंत्री बनाया है। सुशील कुमार शिंदे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रहे। जगन्नाथ पहाड़िया राजस्थान में मुख्यमंत्री बने। हाल ही में चरणजीत सिंह चन्नी पंजाब के मुख्यमंत्री रहे। इसलिए यह कहना कि कांग्रेस ने कभी दलित मुख्यमंत्री नहीं बनाया, पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।

कांग्रेस यह भी कहती है कि उसने सिर्फ राज्यों में ही नहीं, बल्कि देश के बड़े पदों पर भी दलित नेताओं को मौका दिया। के. आर. नारायणन पहले उपराष्ट्रपति बने और बाद में राष्ट्रपति भी बने। बाबू जगजीवन राम देश के रक्षा मंत्री रहे और पार्टी के बड़े नेता भी रहे। मीरा कुमार लोकसभा स्पीकर बनीं। आज मल्लिकार्जुन खड़गे खुद कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।

फिर सवाल उठता है कि यह मुद्दा अभी क्यों उठा। इसकी एक वजह हाल की राजनीति में छिपी है। कांग्रेस के नेता राजेंद्र गौतम ने कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग की। यह मांग ऐसे समय आई है जब कांशीराम की जन्म शताब्दी मनाई जा रही है और उत्तर प्रदेश में चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में दलित वोट बहुत अहम माना जाता है। कभी यह वोट कांग्रेस के साथ था। बाद में बहुजन समाज पार्टी ने इस वोट बैंक को अपने साथ जोड़ लिया। लंबे समय तक यही स्थिति रही। अब कांग्रेस फिर से उसी जमीन पर लौटने की कोशिश कर रही है।

2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने संविधान और आरक्षण की बात जोर से उठाई। इसका थोड़ा असर भी देखने को मिला। कुछ जगहों पर दलित मतदाता फिर कांग्रेस की ओर लौटते दिखे। अब पार्टी चाहती है कि यह भरोसा बना रहे। कांशीराम को भारत रत्न देने की मांग भी उसी कोशिश का हिस्सा मानी जा रही है।

दूसरी तरफ भाजपा इस मौके को हाथ से जाने नहीं देना चाहती। वह कांग्रेस के पुराने रिकॉर्ड पर सवाल उठाकर यह दिखाना चाहती है कि कांग्रेस सिर्फ बात करती है। यही वजह है कि दलित मुख्यमंत्री वाला मुद्दा जोर से उठाया जा रहा है।

सच यह है कि राजनीति में हर बयान के पीछे एक रणनीति होती है। कांग्रेस अपने पुराने फैसलों को गिना रही है। भाजपा सवाल उठा रही है। दोनों की नजर एक ही चीज पर है। वह है वोट।

आम आदमी के लिए यह समझना जरूरी है कि आधी बात सुनकर राय बनाना ठीक नहीं होता। पूरी तस्वीर देखनी चाहिए। कांग्रेस ने दलित नेताओं को पद दिए हैं। यह भी सच है कि इस पर बहस की गुंजाइश हमेशा रहती है कि कितना और क्या किया गया।

आने वाले समय में यह मुद्दा और जोर पकड़ सकता है। खासकर उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में। यहां दलित वोट जिस तरफ जाता है, वहां चुनाव का रुख बदल सकता है। इसलिए यह बहस सिर्फ बयान तक सीमित नहीं रहने वाली।

अभी के लिए इतना साफ है कि यह मामला राजनीति से जुड़ा है। और राजनीति में हर बात का मतलब सिर्फ वही नहीं होता जो पहली नजर में दिखता है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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