
कांग्रेस अब तक भारतीय जनता पार्टी की चुनावी रणनीति को नहीं समझ पाई है। कांग्रेस मुद्दों को उठाने में लगी रहती है, जबकि भारतीय जनता पार्टी चुनाव जीतने पर पूरा ध्यान देती है। 2014 के बाद से यही फर्क बार-बार नतीजों में दिखा है। संगठन में बदलाव के बावजूद कांग्रेस को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। वहीं भारतीय जनता पार्टी लगातार सत्ता में बनी रही। लेखक का मानना है कि कांग्रेस को आत्ममंथन कर अपनी रणनीति बदलनी होगी, वरना नुकसान जारी रहेगा।
-देवेन्द्र यादव-

देश की राजनीति में पिछले एक दशक का दौर एक बड़ा बदलाव लेकर आया है। 2014 के बाद से भारतीय जनता पार्टी ने केंद्र की सत्ता पर लगातार पकड़ बनाए रखी है, जबकि कांग्रेस अपने प्रदर्शन में अपेक्षित सुधार नहीं कर पाई। यह स्थिति केवल लोकसभा तक सीमित नहीं है, बल्कि कई राज्यों में भी इसी तरह का रुझान देखने को मिला है। 2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई। इसके बाद 2019 और 2024 में भी पार्टी ने सत्ता बरकरार रखी। दूसरी ओर कांग्रेस ने इस दौरान अपने संगठन में कई बदलाव किए। सोनिया गांधी के बाद राहुल गांधी अध्यक्ष बने और अब मल्लिकार्जुन खड़गे पार्टी का नेतृत्व कर रहे हैं। इसके बावजूद चुनावी नतीजों में बड़ा बदलाव नहीं दिखा।
हार और आंशिक सुधार की कहानी
2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। 2024 में पार्टी ने कुछ सुधार करते हुए 99 सीटें हासिल कीं, लेकिन सरकार बनाने की स्थिति से अभी भी दूर रही। यह साफ संकेत है कि संगठनात्मक बदलाव के बावजूद चुनावी रणनीति में कमी बनी हुई है।
मौके थे, लेकिन फायदा नहीं उठा सकी कांग्रेस
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के पास कई ऐसे मौके आए जब वह केंद्र की सत्ता के खिलाफ माहौल बना सकती थी। नोटबंदी और जीएसटी जैसे फैसलों से आम जनता और व्यापारियों में असंतोष देखा गया। इसके बाद कोरोना महामारी ने भी लोगों को प्रभावित किया। इन मुद्दों को लेकर विपक्ष को सरकार को घेरने का अवसर मिला, लेकिन कांग्रेस इनका चुनावी लाभ नहीं उठा सकी।
मुद्दों बनाम रणनीति की राजनीति
कांग्रेस और उसके नेता अक्सर बड़े मुद्दों को उठाने में सक्रिय रहे हैं। राहुल गांधी ने संसद से लेकर सड़क तक कई बार सरकार को घेरा है। इसके विपरीत नरेंद्र मोदी और भाजपा इन मुद्दों पर सीधे प्रतिक्रिया देने से बचते हुए चुनावी रणनीति और प्रचार पर ध्यान केंद्रित करते रहे हैं। यही अंतर दोनों दलों के बीच साफ दिखाई देता है। कांग्रेस मुद्दों में उलझी रहती है, जबकि भाजपा चुनाव जीतने की तैयारी पर फोकस करती है।
चुनाव से पहले का भ्रम
हर चुनाव से पहले सत्ता के खिलाफ कई मुद्दे सामने आते हैं। कांग्रेस इन मुद्दों को पकड़कर यह मान लेती है कि जनता सरकार से नाराज है और बदलाव चाहती है। लेकिन यही आकलन कई बार गलत साबित होता है। दूसरी ओर भाजपा इन परिस्थितियों में भी अपनी रणनीति पर काम करती रहती है। वह संगठन को मजबूत करती है, प्रचार तंत्र को सक्रिय करती है और चुनावी गणित पर काम करती है।
आंतरिक खींचतान भी बनी बाधा
कांग्रेस के सामने एक बड़ी चुनौती उसकी आंतरिक स्थिति भी रही है। कई राज्यों में चुनाव से पहले ही मुख्यमंत्री पद को लेकर नेताओं के बीच मतभेद सामने आते हैं। इससे पार्टी की एकजुटता कमजोर होती है और चुनावी असर पड़ता है।
क्या कांग्रेस को बदलनी होगी रणनीति?
विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस को केवल मुद्दे उठाने के बजाय चुनावी रणनीति, संगठन और नेतृत्व के स्तर पर ठोस बदलाव करने होंगे। भाजपा के तरीके को समझना और उसी के अनुसार अपनी रणनीति बनाना समय की मांग है। आने वाले राज्यों के चुनाव इस बात की परीक्षा होंगे कि कांग्रेस ने पिछले अनुभवों से क्या सीखा है। परिणामों के बाद यह साफ होगा कि पार्टी अपने पुराने ढर्रे पर चल रही है या उसने कोई नया रास्ता अपनाया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















