
पश्चिम बंगाल में सभी सीटों पर चुनाव लड़ने के कांग्रेस के फैसले ने सियासत में हलचल बढ़ा दी है। इसका असर संसद में भी दिखा, जहां पहली बार विपक्ष मजबूत एकजुटता के साथ नजर आया और सरकार अपने अहम बिल पास नहीं करवा पाई। अब सवाल यही है कि यह एकता कितने समय तक टिकेगी।
-देवेंद्र यादव-

कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में सभी 294 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए। क्या राहुल गांधी के बंगाल में अपने दम पर सभी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के फैसले का पहला असर संसद के भीतर 17 अप्रैल, शुक्रवार को विपक्षी एकता के रूप में देखने को मिला? जहां महिला आरक्षण बिल और परिसीमन बिल को सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी विपक्ष की एकजुटता के सामने पास नहीं करवा पाई। यदि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव नहीं होते, तो शायद सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी अन्य बिलों की तरह इस बार भी अपने बिल पास कराने में कामयाब हो जाती।
राहुल गांधी के लिए राजनीतिक रूप से संसद में महिला आरक्षण बिल और परिसीमन बिल का गिरना उतना मायने नहीं रखता, उससे कहीं ज्यादा अहम यह है कि उन्होंने विपक्ष को एकजुट कर दिया।
लंबे समय से राजनीतिक गलियारों और मीडिया में यह सवाल उठता रहा कि विपक्ष कहां है। पहली बार संसद के भीतर विपक्ष मजबूत और संगठित नजर आया और इसी वजह से भारतीय जनता पार्टी तीनों बिल पास नहीं करवा पाई।
संसद के भीतर विपक्षी एकता को लेकर राजनीतिक पंडित और विश्लेषक अलग-अलग अनुमान लगा रहे हैं। लेकिन इस एकता के पीछे एक बड़ी वजह पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव माने जा रहे हैं, जहां कांग्रेस ने सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। पश्चिम बंगाल के बाद कांग्रेस 2027 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और 2029 के लोकसभा चुनाव में भी अपने दम पर सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का मन बना चुकी है।
कांग्रेस के इस फैसले की आहट से क्षेत्रीय दलों में घबराहट बढ़ी है, क्योंकि इसका नुकसान कांग्रेस से ज्यादा उन्हें अपने-अपने राज्यों में उठाना पड़ सकता है। शायद यही वजह रही कि 17 अप्रैल, शुक्रवार को संसद में विपक्ष एकजुट नजर आया और इस एकता ने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राजनीतिक मंसूबों पर पानी फेर दिया। अब देखना यह होगा कि यह विपक्षी एकता कब तक कायम रहती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

















