क्या कांग्रेस पश्चिम बंगाल के बाद यूपी और 2029 में देशभर में ‘ऑल-आउट’ दांव खेलेगी?

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फोटो सोशल मीडिया से साभार

-देवेन्द्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

लंबे समय बाद कांग्रेस पश्चिम बंगाल की सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। 2026 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस एकमात्र ऐसा दल है जिसने सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। सत्ताधारी टीएमसी 291 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने 292 उम्मीदवार घोषित किए हैं।

संगठनात्मक कमजोरी और शून्य प्रतिनिधित्व

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस लंबे समय से संघर्ष कर रही है। मौजूदा विधानसभा में कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं है। एक समय जो पार्टी राज्य की सत्ता में हुआ करती थी, आज उसकी स्थिति ऐसी हो गई है कि उसका कोई प्रतिनिधित्व तक नहीं बचा है। कभी कांग्रेस के पास पश्चिम बंगाल में मजबूत और प्रभावशाली नेतृत्व हुआ करता था, लेकिन वर्तमान में न केवल बड़े नेताओं की कमी है, बल्कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का भी अभाव साफ नजर आता है।

तृणमूल कांग्रेस का उभार और कांग्रेस का पतन

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को सबसे बड़ा नुकसान भारतीय जनता पार्टी ने नहीं, बल्कि कांग्रेस से ही निकली ममता बनर्जी ने पहुंचाया। ममता बनर्जी ने तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और 2011 में सत्ता पर काबिज हुईं। तब से लेकर अब तक कांग्रेस राज्य की सत्ता से बाहर है और ममता बनर्जी लगातार सरकार बना रही हैं।

रणनीतिक बदलाव और राहुल गांधी का संकेत

लगता है कि कांग्रेस के रणनीतिकारों और राहुल गांधी को यह बात दो दशक बाद समझ में आई है कि राज्य में संगठन को पुनर्जीवित करने के लिए आक्रामक रणनीति जरूरी है। यही कारण है कि 2026 के चुनाव में कांग्रेस ने लगभग सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। 14 अप्रैल को राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल में चुनावी सभा कर अभियान का शंखनाद किया और अपने निशाने पर भारतीय जनता पार्टी तथा तृणमूल कांग्रेस—दोनों को रखा।

केडर निर्माण पर फोकस

कांग्रेस पश्चिम बंगाल में कितनी सीटें जीतेगी, यह शायद पार्टी नेतृत्व को भी स्पष्ट नहीं है। लेकिन इस रणनीति का उद्देश्य स्पष्ट दिखता है राज्य में पार्टी का केडर फिर से खड़ा करना। इसका लाभ कांग्रेस को 2029 के लोकसभा चुनाव में मिल सकता है। लंबे समय से कार्यकर्ता मांग कर रहे थे कि पार्टी को हर सीट पर चुनाव लड़ना चाहिए, ताकि संगठन जीवित रह सके। देर से ही सही, यह बात अब नेतृत्व ने स्वीकार की है।

क्या यूपी में भी दोहराई जाएगी रणनीति?

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस पश्चिम बंगाल के बाद उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव में भी सभी 403 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी? उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस की स्थिति काफी हद तक पश्चिम बंगाल जैसी ही है। हालांकि यह वही राज्य है जहां से गांधी परिवार का राजनीतिक आधार रहा है और राहुल गांधी रायबरेली से सांसद हैं। ऐसे में क्या कांग्रेस यहां भी वही साहस दिखाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा।

बीजेपी के खिलाफ सीधी लड़ाई का संकेत

राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल से जो शुरुआत की है, वह एक बड़े राजनीतिक बदलाव का संकेत देती है। 14 अप्रैल को मालदा में उनके भाषण से स्पष्ट होता है कि कांग्रेस अब भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ सीधे मुकाबले की रणनीति अपना रही है। राहुल गांधी अब यह समझते नजर आ रहे हैं कि भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ मुखर आवाज अक्सर वही उठाते हैं, जबकि क्षेत्रीय दलों के नेता उस स्तर पर साथ नहीं देते। ऐसे में वे कई बार राजनीतिक रूप से अकेले पड़ जाते हैं। शायद अब उन्हें यह अहसास हो गया है कि भाजपा के खिलाफ संघर्ष में कांग्रेस और उन्हें स्वयं ही मजबूती से आगे आना होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं।)

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