
-राहुल गांधी की अनुपस्थिति में हुए फैसलों पर उठ रहे सवाल
-देवेन्द्र यादव-

पंजाब कांग्रेस में नेताओं के बीच चल रही गुटबाजी को समाप्त करने के लिए कांग्रेस की पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी ने कमान संभाल ली है। पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी के बीच हुई नेताओं की नियुक्तियों का भी वह क्रॉस चेक करेंगी। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि गत दिनों पंजाब में जिन चुनाव समितियों का गठन किया गया और जिन नेताओं को उनका चेयरपर्सन बनाया गया, वह निर्णय किसने लिया। क्या यह फैसला कांग्रेस हाईकमान ने लिया था या राहुल गांधी की सहमति से हुआ था, जबकि वह इस समय विदेश यात्रा पर हैं?
पंजाब कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष के पद को लेकर लंबे समय से गुटबाजी चल रही है। इसी बीच कांग्रेस हाईकमान ने प्रदेश अध्यक्ष को यथावत रखते हुए आगामी विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखकर विभिन्न चुनाव समितियों की घोषणा कर दी। इन समितियों का चेयरपर्सन उन नेताओं को बनाया गया, जो प्रदेश नेतृत्व में बदलाव की मांग कर रहे थे और स्वयं प्रदेश अध्यक्ष बनने की दौड़ में शामिल थे।
हाईकमान की घोषणा के बाद नेताओं के बीच विवाद और गहरा गया। इसके साथ ही यह सवाल भी उठने लगा कि राहुल गांधी के विदेश जाने के दौरान पंजाब कांग्रेस में इतना बड़ा फैसला क्यों और किसने लिया।
दो दिन पहले मैंने अपने ब्लॉग में भी लिखा था कि राहुल गांधी के दिल्ली से बाहर होते ही कांग्रेस के भीतर बड़े फैसले और महत्वपूर्ण नियुक्तियां क्यों हो जाती हैं। मैंने यह भी लिखा था कि जब सोनिया गांधी दिल्ली से बाहर रहती थीं और उनकी अनुपस्थिति में पार्टी के भीतर कोई बड़ा निर्णय या नियुक्ति होती थी, तो विदेश से लौटने के बाद वह उसका क्रॉस चेक करती थीं। लेकिन राहुल गांधी के नेतृत्व के दौर में ऐसा होता दिखाई नहीं देता। इसका लाभ कांग्रेस के भीतर बैठे प्रभावशाली नेता उठाते हैं।
क्या समानांतर पावर सेंटर सक्रिय है?
अब खबर आ रही है कि पंजाब कांग्रेस की गुटबाजी समाप्त करने के लिए श्रीमती सोनिया गांधी ने स्वयं कमान संभाल ली है। वह हाल में हुई नियुक्तियों का क्रॉस चेक कर रही हैं कि ये नियुक्तियां किसके निर्णय से की गईं और विरोध के बावजूद प्रदेश अध्यक्ष को क्यों नहीं बदला गया।
लेकिन सवाल यह भी है कि जब सोनिया गांधी पंजाब कांग्रेस में हुई नियुक्तियों की समीक्षा कर रही हैं, तो क्या उन्हें यह भी नहीं देखना चाहिए कि कहीं कांग्रेस के भीतर कोई समानांतर शक्ति केंद्र तो सक्रिय नहीं है? क्योंकि कई बार ऐसा प्रतीत होता है कि राहुल गांधी और पार्टी हाईकमान जो निर्णय लेते हैं, संगठन के भीतर काम उससे अलग दिशा में होता है। वर्ष 2014 के बाद से इस तरह की स्थिति लगातार देखने को मिल रही है।
कांग्रेस का वास्तविक पावर सेंटर कौन?
सवाल यह भी खड़ा होता है कि कांग्रेस के भीतर बड़ा पावर सेंटर 10 जनपथ है, 10 राजाजी मार्ग है, या फिर इन दोनों से भी बड़ा कोई ऐसा शक्ति केंद्र है जो सामने दिखाई नहीं देता, लेकिन संगठन के भीतर बड़े फैसले कर रहा है और राहुल गांधी के निर्णयों को प्रभावित या पलट रहा है।
राहुल गांधी को विदेश यात्रा से लौटने के बाद इस पूरे विषय पर गंभीरता से मंथन करना चाहिए कि पार्टी के भीतर बड़ी नियुक्तियां कैसे और किसके स्तर पर हो रही हैं। ऐसी स्थिति कांग्रेस को मजबूत करने के बजाय कमजोर करती है। साथ ही राज्यों में नेताओं के बीच चल रही गुटबाजी और विवाद भी कम होने के बजाय और अधिक बढ़ते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेख उनके निजी विचार हैं।)

















