2028 की राह में कांग्रेस: एकजुटता से वापसी या गुटबाजी से नुकसान?

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photo courtesy social media

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

राजस्थान की सत्ता में 2028 में कांग्रेस की वापसी होगी या नहीं, यह काफी हद तक कांग्रेस हाईकमान की ओबीसी एडवाइजरी कमेटी के तीन प्रमुख नेताओं पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा और कांग्रेस के राष्ट्रीय महामंत्री सचिन पायलटकी एकजुटता पर निर्भर करेगा। यदि ये तीनों नेता राहुल गांधी के नेतृत्व में साथ बने रहते हैं, तो कांग्रेस 2028 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज कर सकती है। लेकिन यदि ये नेता व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के तहत खुद को मुख्यमंत्री बनाने की सलाह देने लगते हैं, तो स्थिति अन्य राज्यों जैसी हो सकती है, जहां गुटबाजी ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया। यह केवल विश्लेषण नहीं, बल्कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच चल रही चर्चा का सार है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि गहलोत, पायलट और डोटासरा एकजुट होकर चुनाव लड़ें, तो कांग्रेस की सत्ता में वापसी संभव है। 2023 के विधानसभा चुनाव की कड़वी याद अभी भी ताजा है, जब कांग्रेस दूसरी बार सरकार बनाकर इतिहास रचने के करीब थी, लेकिन मुख्यमंत्री पद को लेकर गहलोत और पायलट के बीच विवाद ने सत्ता हाथ से निकलवा दी।

एससी-एसटी समीकरण और तीसरी ताकत की चुनौती

राजस्थान में राहुल गांधी के सामने चुनौती केवल ओबीसी नेताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि 2028 के चुनाव में एससी-एसटी वर्ग के नेताओं की आकांक्षाएं भी अहम भूमिका निभाएंगी। इन वर्गों के एडवाइजर्स के मन में भी मुख्यमंत्री पद की इच्छा मौजूद है। राज्य में भले ही चुनावी मुकाबला भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा दिखता हो, लेकिन बहुजन समाज पार्टी और जनजातीय राजनीति से जुड़े दल कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाते हैं। इसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिलता है, जिससे कांग्रेस की राह कठिन हो जाती है।

अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व और ओवैसी फैक्टर

2028 के विधानसभा चुनाव में यदि असदुद्दीन ओवैसी ने राजस्थान में सक्रिय भूमिका निभाई, तो कांग्रेस के लिए सत्ता में वापसी आसान नहीं होगी। चुनाव को ध्यान में रखते हुए सभी राजनीतिक दल अपनी रणनीतियां बना रहे हैं। राजस्थान कांग्रेस के भीतर मुस्लिम कार्यकर्ता और नेता राहुल गांधी से मांग कर रहे हैं कि इस बार राज्यसभा में राजस्थान से किसी मुस्लिम नेता को भेजा जाए। खास बात यह है कि मुस्लिम नेता मुख्यमंत्री पद की दौड़ में नहीं हैं, बल्कि केवल एक राज्यसभा सीट की मांग कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर ओबीसी, एससी और एसटी वर्ग के नेता मुख्यमंत्री पद की दावेदारी कर रहे हैं। ऐसे में राहुल गांधी के सामने बड़ी चुनौती यह है कि वे इन सभी वर्गों के बीच संतुलन कैसे बनाते हैं।

कार्यकर्ताओं का भरोसा बनाम नेताओं की गुटबाजी

राजस्थान में कांग्रेस कमजोर नहीं है। पार्टी का कार्यकर्ता आज भी पूरी ईमानदारी से मेहनत करता है और मजबूत वोट बैंक भी मौजूद है। लेकिन असली समस्या भरोसे की है। जिन नेताओं पर कार्यकर्ता भरोसा करते हैं, वही नेता मुख्यमंत्री पद को लेकर आपस में टकरा जाते हैं। इसका सीधा नुकसान पार्टी को चुनाव में उठाना पड़ता है। यदि नेतृत्व स्तर पर यह गुटबाजी खत्म नहीं हुई, तो कार्यकर्ताओं की मेहनत पर पानी फिरता रहेगा और सत्ता से दूरी बनी रह सकती है।

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