
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि क्या पार्टी किसी अल्पसंख्यक या जमीनी कार्यकर्ता को मौका देगी। फिलहाल राज्यसभा में कांग्रेस के मुस्लिम सदस्यों की संख्या काफी सीमित है, जबकि देश के कई हिस्सों में मुस्लिम मतदाता अब भी कांग्रेस को समर्थन देता रहा है।
-देवेन्द्र यादव-

कांग्रेस में इन दिनों एक बार फिर लीडरशिप डेवलपमेंट मिशन की चर्चा तेज हो गई है। राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा के बाद पार्टी के भीतर और बाहर इस मिशन को लेकर बहस शुरू हुई है। सवाल यह उठ रहा है कि जब यह मिशन राज्यों के विधानसभा और लोकसभा चुनाव में खास असर नहीं दिखा पाया, तो अब इसकी चर्चा क्यों होने लगी है। इस फर्क को समझने के लिए पिछले कुछ वर्षों की घटनाओं पर नजर डालना जरूरी है।
मिशन की शुरुआत और तैयारी
साल 2023 में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए राहुल गांधी ने लीडरशिप डेवलपमेंट मिशन की शुरुआत की थी। इस मिशन की जिम्मेदारी पूर्व आईएएस अधिकारी के. राजू को दी गई थी। इसका मकसद दलित, आदिवासी, ओबीसी और अल्पसंख्यक वर्ग के ऐसे कार्यकर्ताओं को सामने लाना था जो लंबे समय से जमीन पर काम कर रहे थे। तीनों राज्यों में ब्लॉक और जिला स्तर पर कार्यकर्ताओं की पहचान की गई और संगठन को मजबूत करने की कोशिश की गई।
जमीनी नेताओं की तलाश
मिशन के तहत उन कार्यकर्ताओं को आगे लाने की योजना थी जो स्थानीय स्तर पर मजबूत पकड़ रखते हैं और चुनाव जीतने की क्षमता रखते हैं। इससे यह संदेश भी देने की कोशिश थी कि पार्टी केवल पुराने और प्रभावशाली नेताओं तक सीमित नहीं है। कई जगहों पर नए चेहरों को लेकर उत्साह भी दिखाई दिया। उस समय यह माना जा रहा था कि इस रणनीति के सहारे कांग्रेस राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपनी सरकार दोबारा बना सकती है और मध्य प्रदेश में वापसी कर सकती है।
टिकट वितरण में मिशन कमजोर पड़ा
हालांकि जब उम्मीदवारों की घोषणा का समय आया तो स्थिति बदल गई। लंबे समय से राजनीति में सक्रिय बड़े नेताओं ने टिकट वितरण में अपना प्रभाव दिखाया। लीडरशिप डेवलपमेंट मिशन के तहत तैयार की गई सूची को काफी हद तक नजरअंदाज कर दिया गया। कई जगहों पर स्थानीय नेताओं के बीच आपसी समझ से टिकटों का बंटवारा हो गया। इससे मिशन की मूल भावना कमजोर पड़ गई।
दिल्ली की बैठक और अचानक मोड़
बताया जाता है कि टिकटों को लेकर विवाद राहुल गांधी तक भी पहुंचा था। इस मुद्दे पर चर्चा के लिए राजस्थान के कई वरिष्ठ नेताओं को दिल्ली बुलाया गया। राहुल गांधी स्क्रीनिंग कमेटी और प्रदेश नेताओं से बात कर रहे थे। इसी दौरान कांग्रेस के राष्ट्रीय मीडिया प्रभारी जयराम रमेश प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए राहुल गांधी को बैठक से बाहर ले गए। इसके बाद उम्मीदवारों के चयन को लेकर कोई लंबी चर्चा नहीं हो सकी और जल्द ही सूची जारी कर दी गई। चुनाव परिणामों में कांग्रेस को अपेक्षित सफलता नहीं मिली।
लोकसभा चुनाव में असर
हालांकि लीडरशिप डेवलपमेंट मिशन का असर पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने संविधान बचाओ और आरक्षण बचाओ का नारा जोर से उठाया। सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों के मुद्दों को सामने रखने की रणनीति का असर भी दिखाई दिया। इसी माहौल में कांग्रेस ने लोकसभा में 99 सीटें जीतकर अपनी स्थिति पहले से बेहतर कर ली।
राज्यसभा चुनाव में नई झलक
हाल ही में घोषित राज्यसभा उम्मीदवारों में भी इस मिशन की झलक देखने को मिली। कांग्रेस ने ऐसे कई नेताओं को मौका दिया है जो लंबे समय से संगठन में काम कर रहे हैं और जिनकी पहचान जमीनी कार्यकर्ता के रूप में है। खास बात यह रही कि दिल्ली की राजनीति में सक्रिय कई बड़े नेता भी टिकट की उम्मीद लगाए बैठे थे, लेकिन पार्टी ने अपेक्षाकृत नए और सक्रिय चेहरों को प्राथमिकता दी।
राजस्थान को लेकर उठते सवाल
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या कांग्रेस यही रणनीति आगे भी जारी रखेगी। राजस्थान से राज्यसभा के लिए अभी उम्मीदवार का चयन बाकी है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि क्या पार्टी किसी अल्पसंख्यक या जमीनी कार्यकर्ता को मौका देगी। फिलहाल राज्यसभा में कांग्रेस के मुस्लिम सदस्यों की संख्या काफी सीमित है, जबकि देश के कई हिस्सों में मुस्लिम मतदाता अब भी कांग्रेस को समर्थन देता रहा है।
सामाजिक समीकरण और भविष्य की रणनीति
राजस्थान में दलित, आदिवासी, ओबीसी और मुस्लिम मतदाताओं का कई सीटों पर बड़ा प्रभाव है। अनुमान है कि लगभग 75 से 100 विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां इन वर्गों की भूमिका निर्णायक रहती है। यही वजह है कि राज्य में कांग्रेस की सामाजिक आधार वाली राजनीति अपेक्षाकृत मजबूत मानी जाती है। अब देखना यह होगा कि क्या पार्टी राज्यसभा के जरिए इन सामाजिक समीकरणों को नया संदेश देती है या फिर परंपरागत राजनीतिक समीकरण ही हावी रहते हैं।

















