पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को दिखी उम्मीद की किरण?

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-राहुल गांधी की सभाओं में मिल रहा समर्थन

-बंपर मतदान से बदले समीकरण

-क्या कांग्रेस इस बार खाली हाथ नहीं लौटेगी?

-देवेंद्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी को उम्मीद की एक नई किरण दिखाई देने लगी है। राहुल गांधी सहित कांग्रेस नेताओं की चुनावी सभाओं और जनसंपर्क अभियानों के दौरान मिल रहा जनसमर्थन यह संकेत दे रहा है कि 2026 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस खाली हाथ नहीं लौटेगी। ऐसा प्रतीत होता है कि बंगाल की जनता इस बार कांग्रेस को भी विधानसभा में प्रतिनिधित्व का अवसर दे सकती है।

23 अप्रैल को हुए पहले चरण के बंपर मतदान ने राजनीतिक विश्लेषकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि आखिर बंगाल में किस पार्टी की सरकार बनेगी। पहले चरण में 92 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया। अब सवाल यह है कि यह भारी मतदान सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में जाएगा, प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी को लाभ देगा, या फिर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही कांग्रेस को इसका फायदा मिलेगा।

यदि 2014 के बाद भारतीय जनता पार्टी के राज्यों के चुनावी ट्रैक रिकॉर्ड को देखा जाए, तो कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहां चुनाव के दौरान कमजोर नजर आने के बावजूद परिणाम भाजपा के पक्ष में गए। लेकिन पश्चिम बंगाल में पहले चरण के भारी मतदान को लेकर यदि कोई दल ज्यादा चिंतित नहीं दिख रहा है, तो वह कांग्रेस है। कांग्रेस को उम्मीद है कि बंगाल का मतदाता उसे एक बार फिर अवसर देगा। राहुल गांधी ने 24 अप्रैल को अपनी चुनावी सभा में मतदाताओं से कांग्रेस को मौका देने की अपील भी की है।

बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच चल रहे तीखे राजनीतिक संघर्ष का लाभ कांग्रेस को मिल सकता है। हालांकि यह लाभ कितना होगा, इसका पता चुनाव परिणाम आने के बाद ही चलेगा। भाजपा के पिछले ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए एक सवाल यह भी उठता है कि क्या भाजपा कुछ सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को रोकने के लिए अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस को फायदा पहुंचा सकती है। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि भाजपा के रणनीतिकार कई बार सत्ता हासिल करने या सत्ताधारी दल को कमजोर करने के लिए अप्रत्यक्ष रणनीतियां अपनाते रहे हैं।

बिहार चुनाव इसका एक उदाहरण है, जहां यह माना जा रहा था कि इंडिया गठबंधन सरकार बना लेगा, लेकिन परिणाम इसके विपरीत आए। राष्ट्रीय जनता दल, जो सरकार बनाने की स्थिति में नजर आ रही थी, चुनाव हार गई और भाजपा-जदयू गठबंधन को अपेक्षित सफलता मिली। उड़ीसा और दिल्ली में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जहां भाजपा ने बीजू जनता दल और आम आदमी पार्टी से सत्ता छीन ली।

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस कितनी सीटें जीतेगी, इसका स्पष्ट जवाब तो 4 मई को आने वाले परिणामों के बाद ही मिलेगा, लेकिन भविष्य के राजनीतिक संकेत अभी से दिखाई देने लगे हैं।

कांग्रेस का राज्यों में सत्ता से बाहर होना केवल भाजपा के कारण नहीं हुआ है, बल्कि क्षेत्रीय दलों के उभार ने भी इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। कई राज्यों में कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के कारण कमजोर हुई और चुनाव हारती गई। यदि भविष्य में क्षेत्रीय दल कमजोर होते हैं, तो इसका सीधा लाभ कांग्रेस को मिल सकता है, क्योंकि उसका पारंपरिक मतदाता उन्हीं दलों के पास गया था।

ऐसे में, यदि क्षेत्रीय दलों का प्रभाव घटता है, तो कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधी राजनीतिक टक्कर देखने को मिल सकती है, जिसका लाभ कांग्रेस को मिल सकता है। इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या भाजपा अनजाने में कांग्रेस के लिए रास्ता आसान कर रही है? जो काम कांग्रेस खुद नहीं कर पाई, क्या वह भाजपा की रणनीतियों के कारण संभव हो रहा है?

दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को सत्ता से बाहर करने में भाजपा नहीं, बल्कि आम आदमी पार्टी की भूमिका रही थी। अब आम आदमी पार्टी के कुछ नेता और सांसद भाजपा में शामिल हो चुके हैं, जिससे यह चर्चा तेज हो गई है कि भाजपा आम आदमी पार्टी को भी कमजोर कर सकती है। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ जो हुआ, वैसा ही परिदृश्य अन्य राज्यों में भी बन सकता है।

इसी तरह की संभावना पश्चिम बंगाल में भी बनती दिख रही है, जहां भाजपा अपनी सरकार बनाने के प्रयास में जुटी है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस राजनीतिक संघर्ष के बीच कांग्रेस अपनी जगह कितनी मजबूत कर पाती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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