
-प्रत्याशी चयन पर उठ रहे हैं सवाल
-देवेन्द्र यादव-

इसी महीने जून में संपन्न होने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने अपने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है। कर्नाटक, तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, झारखंड और राजस्थान में घोषित उम्मीदवारों में एक-दो नामों को छोड़कर अधिकांश नामों को लेकर कांग्रेस के भीतर ही सवाल उठ रहे हैं। चर्चा यह है कि क्या कांग्रेस के चतुर और प्रभावशाली नेताओं ने राज्यसभा टिकटों की आपस में बंदरबांट कर ली है?
यदि विधानसभा और लोकसभा चुनावों में प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया को देखें, तो बाहर से ऐसा प्रतीत होता है कि उम्मीदवारों के चयन में राहुल गांधी की बड़ी भूमिका होती है। इसका कारण यह है कि राज्यों से अक्सर एक पंक्ति का प्रस्ताव भेजा जाता है कि हाईकमान जो निर्णय करेगा, वह सभी को स्वीकार होगा। अंतिम सूची भी हाईकमान के नाम से ही जारी होती है।
लेकिन सवाल यह है कि क्या प्रत्याशियों के चयन की पूरी प्रक्रिया वास्तव में राहुल गांधी ही देखते हैं? क्या जिन उम्मीदवारों को राहुल गांधी पसंद करते हैं, वही उम्मीदवार घोषित होते हैं? या फिर कांग्रेस के भीतर प्रभावशाली नेता एक लाइन के प्रस्ताव की आड़ में टिकट के इच्छुक नेताओं, कार्यकर्ताओं और यहां तक कि गांधी परिवार को भी गुमराह कर अपने पसंदीदा लोगों को आगे बढ़ा देते हैं?
क्या राहुल गांधी को फैसलों से दूर रखा जाता है?
मैंने अपने ब्लॉग में कई बार लिखा है कि जब भी चुनाव का समय आता है और जीतने योग्य उम्मीदवारों के चयन जैसे महत्वपूर्ण निर्णय लिए जाने होते हैं, तब कांग्रेस के कुछ प्रभावशाली नेता राहुल गांधी को दिल्ली से बाहर के दौरों पर भेज देते हैं। उनकी गैरमौजूदगी में वे अपने समर्थकों के नामों पर सहमति बनाकर सूची तैयार कर लेते हैं और राहुल गांधी के दिल्ली लौटने से पहले उम्मीदवारों की घोषणा भी हो जाती है।
पांच राज्यों में राज्यसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की घोषणा के दौरान भी कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिला। एक ओर राहुल गांधी उत्तराखंड के पहाड़ों और बाद में अंडमान-निकोबार के दौरे पर थे, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस ने अपने राज्यसभा प्रत्याशियों की सूची जारी कर दी।
यह पहली बार नहीं हुआ है। कांग्रेस के भीतर अक्सर विधानसभा चुनावों के दौरान भी ऐसा ही परिदृश्य देखने को मिलता है। जब भी कोई महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसला लिया जाना होता है, तब राहुल गांधी को दिल्ली से बाहर व्यस्त रखा जाता है और टिकटों का बंटवारा अंदरखाने तय कर लिया जाता है। बाद में कई राज्यों में पार्टी को चुनावी नुकसान उठाना पड़ता है।
हिंदी पट्टी में मुस्लिम प्रतिनिधित्व पर सवाल
राजस्थान, मध्य प्रदेश और झारखंड में प्रत्याशियों के चयन को लेकर स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं के बीच आश्चर्य का माहौल है। कई कार्यकर्ताओं को विश्वास नहीं हो रहा कि जिन नामों की घोषणा हुई है, वे वास्तव में राहुल गांधी की प्राथमिकता रहे होंगे।
विशेष रूप से मुस्लिम प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं का मानना है कि जिन राज्यों में मुस्लिम समुदाय को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व दिया जा सकता था, वहां ऐसा नहीं किया गया। इसके विपरीत, ऐसे राज्यों में टिकट दिया गया जहां पहले से ही मुस्लिम समुदाय का प्रतिनिधित्व मौजूद है।
दलित-मुस्लिम एकता के संदेश और राजनीतिक सवाल
6 जून को दिल्ली स्थित कांग्रेस मुख्यालय में दलित और अल्पसंख्यक वर्गों की एकता को लेकर एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें देशभर से आए दलित और मुस्लिम नेताओं एवं कार्यकर्ताओं ने भाग लिया और इस बात पर चर्चा की कि इन वर्गों के पारंपरिक मतदाताओं को कांग्रेस से फिर कैसे जोड़ा जाए।
बैठक में कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं ने यह सवाल भी उठाया कि जब पार्टी दलित-मुस्लिम एकता की बात कर रही है, तो हिंदी पट्टी के उन राज्यों में मुस्लिम समुदाय को राज्यसभा में प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया गया, जहां उनकी आबादी और राजनीतिक प्रभाव दोनों महत्वपूर्ण हैं। उनका मानना था कि इस विषय पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
मीडिया प्रबंधन से जुड़े नेताओं को टिकट मिलने पर भी चर्चा
कांग्रेस के भीतर एक और चर्चा यह है कि मीडिया और संचार रणनीति से जुड़े तीन नेताओं को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया गया है। इन नामों को लेकर भी पार्टी के गलियारों में बहस चल रही है।
कुछ नेताओं का मानना है कि अल्पसंख्यक वर्ग से आने वाले प्रवक्ता और कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) के सदस्य गुरदीप सिंह सप्पल भी राज्यसभा के मजबूत दावेदार हो सकते थे। उनका तर्क है कि सप्पल प्रशासनिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर प्रभावशाली नेता हैं तथा चुनावी रणनीति तैयार करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उत्तराखंड में कांग्रेस के संगठनात्मक और राजनीतिक प्रयासों में भी उनका योगदान दिखाई देता है।
राहुल गांधी को आत्ममंथन की जरूरत?
कुल मिलाकर सवाल यह है कि क्या कांग्रेस के भीतर कुछ प्रभावशाली रणनीतिकार महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसलों के समय राहुल गांधी को दिल्ली से बाहर रखने में सफल हो जाते हैं? यदि ऐसा है, तो इस पर स्वयं राहुल गांधी को आत्ममंथन करना चाहिए। कई कार्यकर्ताओं का मानना है कि कांग्रेस के कमजोर होने और राज्यों में सत्ता से दूर रहने के पीछे संगठन के भीतर टिकट वितरण की यही संस्कृति एक बड़ा कारण है। उनका आरोप है कि चुनाव के समय एक लाइन के प्रस्ताव की आड़ में टिकटों का बंटवारा सीमित समूहों के बीच तय कर लिया जाता है और अंतिम सूची राहुल गांधी के दिल्ली लौटने से पहले जारी कर दी जाती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

















