नाम के अनुरुप क्रिकेट के बादशाह थे सलीम भाई

सलीम भाई ने चार्ली ग्रिफिथ की गेंद पर एक जोरदार स्ट्रेट छक्का मारा था, जो सीसीआई की बालकनी में गिरा। उन्होंने बल्ले के पूरे फॉलो-थ्रू के साथ गेंद पर स्ट्रोक खेला था। यह वाकई जादुई झण थे। हालांकि, यही कारनामा दोहराने के चक्कर में गैरी सोबर्स ने उन्हें जल्द ही बोल्ड कर दिया । वह अगले पांच वर्षों के लिए टेस्ट क्रिकेट से बाहर कर दिए गए। जिसके कारणों का पता मुझे कई वर्षों बाद चला।

जैसा मैंने उसे देखा: सलीम दुरानी की मेरी यादें

-रामेश्वर सिंह-

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सलीम दुर्रानी का साक्षात्कार करते खेल पत्रकार रामेश्वर सिंह। फाइल फोटो

भारतीय क्रिकेट टीम से कई मुस्लिम क्रिकेटर खेले लेकिन कप्तान मंसूर अली खान के अलावा किसी क्रिकेटर ने क्रिकेट प्रेमियों के दिल पर राज किया तो वह सलीम दुर्रानी थे। 1960 और 1970 के दशक की शुरुआत में सलीम दुर्रानी स्टार क्रिकेटर थे। सलीम वह नाम है जो मुगल बादशाह अकबर ने हिंदू पत्नी जोधा से पैदा हुए अपने बेटे को दिया था। मुगले आजम फिल्म की वजह से सलीम नाम रोमांस और स्वच्छंद प्रवृति का प्रतीक माना जाने लगा।  सलीम दुर्रानी की क्रिकेट वाकई उनके नाम के प्रतीक की तरह ही रही। सलीम दुर्रानी के खेल और उनका व्यक्तित्व ही ऐसा था कि क्रिकेट प्रेमी उनके दीवाने थे और उनका खेल देखने के लिए मैदान पर पहुंचते थे। उनके छक्के भी कई दफा दर्शका दीर्घा में पहुंचते थे क्योंकि दर्शक यही उम्मीद भी करते थे। हालांकि कई बार वह सफल होते और कभी नहीं लेकिन दर्शकों की उम्मीद कायम रहती। इसी वजह से वह एक क्रिकेटर के तौर पर लोकप्रिय होने के साथ ही दर्शकों को आकर्षित करने में सफल हुए।

मैंने पहली बार सलीम दुरानी को 1966 में देखा था (क्रिकइन्फो वेबसाइट पर इसकी जाँच की है और 13 दिसंबर का दिन था)। मेरे एक सेना में अधिकारी रिश्तेदार ने तत्कालीन बॉम्बे के ब्रेबोर्न स्टेडियम में वेस्ट इंडीज के खिलाफ टेस्ट के लिए दो सीज़न टिकट खरीदे थे। चूंकि दूसरा टिकट किसी और के लिए था, जो मैच देखने नहीं आ सका ऐसे में मेरे चचेरे भाई ने मैच देखने के लिए मुझे साथ ले लिया। भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए अपनी आधी टीम गंवा दी थी तब एक लम्बा और आकर्षक नौजवान क्रीज पर आता दिखा। मेरे चचेरे भाई ने बताया था कि यह क्रिकेटर राजस्थान के लिए रणजी ट्रॉफी खेलता है। वह नौजवान मुझे राजकपूर के खानदान टाइप का गोरा चिट्टा और खूबसूरत तथा स्मार्ट नजर आया जिससे मैं तुरंत ही बहुत प्रभावित हुआ। उन्होंने विकेट की ओर बढ़ते समय एक फिल्मी हीरो की तरह अपने दस्ताने वाले दाहिने हाथ से अपने बालों को दो बार पीछे की ओर झटका।

मुझे उनकी पारी के शुरुआती हिस्से के बारे में ज्यादा कुछ याद नहीं है, सिवाय इसके कि जब डेव होलफोर्ड ने उनका कैच ड्रॉप किया तो भीड़ ने राहत की सांस ली थी। जब टी ब्रेक हुआ तो मैंने अपने चचेरे भाई से पूछा कि क्या हम घर चलें क्योंकि मेरे जैसे बच्चे के लिए एक जगह पर इतनी देर तक बैठना काफी असहज था। लेकिन अच्छा ही हुआ कि मेरे भाई ने मेरा आग्रह नहीं माना क्योंकि अगर उसने ऐसा किया होता, तो मैं कुछ ऐसा देखने से चूक जाता, जिसकी वजह से न केवल मुझे इस खेल से प्यार हुआ, बल्कि मैं खुद सलीम दुर्रानी का प्रशंसक भी बन गया। सलीम भाई ने चार्ली ग्रिफिथ की गेंद पर एक जोरदार स्ट्रेट छक्का मारा था, जो सीसीआई की बालकनी में गिरा। उन्होंने बल्ले के पूरे फॉलो-थ्रू के साथ गेंद पर स्ट्रोक खेला था। यह वाकई जादुई झण थे। हालांकि, यही कारनामा दोहराने के चक्कर में गैरी सोबर्स ने उन्हें जल्द ही बोल्ड कर दिया । वह अगले पांच वर्षों के लिए टेस्ट क्रिकेट से बाहर कर दिए गए। जिसके कारणों का पता मुझे कई वर्षों बाद चला।

मैंने अगली बार उन्हें 1969 में जयपुर के तत्कालीन अर्द्ध निर्मित सवाई मानसिंह स्टेडियम में बिल लॉरी की ऑस्ट्रेलियाई टीम के खिलाफ सेंट्रल जोन की ओर से खेलते हुए देखा। उस समय बहुत से दर्शक कमेंट्री सुनने अपने साथ ट्रांजिस्टर भी लेकर आते थे। इससे उन्हें मैदान में खिलाडी को पहचानने में मदद मिलती थी। मैं इस मैच में राज सिंह डूंगरपुर की कमेंट्री को भी याद कर सकता हूं। वह अपनी समृद्ध सुसंस्कृत आवाज में मैच का वर्णन करते थे। उनकी आवाज आई… “सांगानेर छोर से मेन ने दुर्रानी को गेंद डाली… और दुर्रानी ने हुक किया…” यह मोहक करने वाला शॉट था। मुझे ऑफ स्पिनर एशले मैलेट भी याद हैं, जिन्होंने उस सीरीज में ढेर सारे विकेट लिए थे। मैलेट ने दुर्रानी के लेग स्टंप पर लगातार आक्रमण किया लेकिन दुर्रानी ने बार-बार टर्न के खिलाफ उनकी गेंद को स्वीप किया। उन्होंने उस मैच में एक बल्लेबाज और एक गेंदबाज दोनों के रूप में बहुत अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन चयनकर्ताओं ने उन्हें नजरअंदाज कर दिया।
तीसरी बार मैंने उन्हें 1970 के दशक की शुरुआत में अजमेर के मेयो कॉलेज मैदान में एक रणजी मैच में खेलते देखा था। इस मैदान को इंग्लैण्ड के कप्तान रहे आर्थर गिलिगन ने उनके द्वारा देखे गए सबसे मनोरम मैदानों में से एक के रूप में वर्णित किया था। उक्त रणजी मैच में राजस्थान पहली पारी में विदर्भ से पिछड़ गया था और उसे जीत के लिए दूसरी पारी में तेजी से रन बनाने की जरुरत थी। जब दुर्रानी बल्लेबाजी करने उतरे तो दूसरे छोर पर मेरे बचपन के एकअन्य हीरो क्रिकेटर लक्ष्मण सिंह थे। मुझे याद है कि सलीम भाई ने स्ट्राइक लेने से पूर्व लक्ष्मण सिंह को कुछ कहा था। यह तो पता नहीं उन्होंने क्या कहा था, लेकिन इसके बाद जो हुआ वह बेमीसाल बल्लेबाजी का प्रदर्शन था। यह बल्लेबाजी बरसों बाद आज भी मेरी स्मृति में गहराई से अंकित है। उन्होंने मिड ऑफ की ओर एक आसान पुश के साथ अपनी पारी की शुरुआत की और फिर असली एक्शन में आ गए। यह मैच मैंटिंग विकेट पर खेला गया था, फिर भी वह मध्यम गति के तेज गेंदबाज अशोक भागवत और अनिल देशपांडे को बेफिक्र होकर खेले जा रहे थे। वह मध्यम तेज गेंदबाजों को भी एक घुटना मोडकर शॉट लगा रहे थे। उनके शाट्स पर गेंद घास पर मानो तैरती हुई तेजी से बाउंड्री की ओर जाती दिखाई देती थी।
एक समय पर, विदर्भ के कप्तान अरुण ओगीरल ने लेग साइड की सीमा पर सात क्षेत्ररक्षक तैनात कर दिए थे, लेकिन फिर भी दुर्रानी ने उन्हें आसानी से छकाया। हालांकि उनके कुछ गलत शॉट भी थे लेकिन हम जो बल्लेबाजी देख रहे थे, उससे हम सभी बहुत खुश थे। उन्होंने अर्द्धशतक लगाकर आखिरी दिन राजस्थान को जीत दिला दी।
इसके बाद तो मैं सलीम भाई का प्रशंसक हो गया। मैं रेडियो पर सलीम भाई की बल्लेबाजी की कमेंट्री सुनता। उनके प्रदर्शन पर नजर रखता। मुझे उन्हें फिर से 1976 में एक अंतरराष्ट्रीय टीम के खिलाफ देखते देखने का मौका मिला। यह मध्य क्षेत्र और टोनी ग्रेग कीे एमसीसी टीम के बीच का मैच था। उस मैच को क्रिस ओल्ड की पहली गेंद से हुई नाटकीय शुरुआत के लिए ज्यादा याद किया जाता है। इस मैच में जैसे ही तेज गेंदबाज क्रिस ओल्ड ने अपना रन अप शुरू किया तो सेंट्रल जोन के ओपनर इब्राहिम अंसारी ने स्टंप छोडना शुरू कर दिया। क्रिस ओल्ड ने जब तक गेंद फेंकी, तब तक अंसारी उस जगह थे जहां 9वां या 10वां स्टंप होना चाहिए था। सलीम भाई तब 43 साल के हो चुके थे लेकिन फिर भी उन्हें भारतीय टीम में वापसी की उम्मीद थी। उस दिन मैंने उन्हें इस तरह से बल्लेबाजी करते देखा जैसा मैंने पहले कभी नहीं देखा था। उन्होंने क्रिकेट की कलात्मक शैली को अपनाया। प्रत्येक गेंद के पीछे आना, पूरा सिर नीचा करना और गेंद को उसकी वरीयता से खेलना। उन्होंने एक घंटे में सिर्फ नौ रन बनाए। लेकिन यहां भी एक जादुई क्षण आया जब उन्होंने अपनी पारी के दौरान ज्योफ मिलर की गेंद पर लेट कट से गेंद को बाउंड्री के पार भेजा। उस शॉट को खेलने के बाद, वह मुस्कुराए और साइट स्क्रीन के पास बैठे अपने दोस्त एमएल जयसिम्हा (जो उस समय भारतीय टीम के चयनकर्ता थे) की ओर हाथ हिलाया। जयसिम्हा भी जवाब में मुस्कुराए और हाथ हिलाया।
दूसरी पारी में, सलीम भाई ने अनावश्यक रूप से दूसरा रन लेने के चक्कर में अपना विकेट गंवा दिया। उन्होंने अपने समय के सर्वश्रेष्ठ फील्डर डेरेक रेंडल के खिलाफ दूसरा रन लेने की कोशिश की और रन आउट हो गए। मैंने क्रिकेट के मैदान पर उन्हें आखिरी बार खेलते देखा था।

सलीम भाई को अपनी गेंदबाजी पर बहुत गर्व था। और हम सभी जानते हैं कि कैसे उन्होंने 1971 में पोर्ट ऑफ स्पेन टेस्ट में सोबर्स और लॉयड के विकेट लिए। उन्होंने 1961-62 में अपनी गेंदबाजी से टेड डेक्सटर की टीम के छक्के छुडा दिए थे। वह अपनी लम्बी और पतली अंगुलियों से गेंद को अपनी इच्छा के अनुरुप टर्न देने में सक्षम थे। एक तरह से वह गेंद को अपनी मनमर्जी से पिच करते और उसकी दिशा तय करते थे। 1974 का राजस्थान और कर्नाटक के बीच का रणजी ट्रॉफी फाइनल इसका उदाहरण है। जिसका मैं अपने पिछले एपीसोड में वर्णन कर चुका हूं कि कैसे उन्होंने पार्थसारथी शर्मा को भारतीय टीम में स्थान दिलाने के लिए उनके प्रतिद्वंद्वी बृजेश पटेल को अपनी फिरकी पर नचा दिया था। लेकिन सामने टीम में प्रसन्ना जैसा धुंरधर था जिसने पारथ को रन नहीं बनाने दिए।

(लेखक हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के पत्रकार हैं)

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