
असम चुनाव में कांग्रेस ने पप्पू यादव को प्रचार के लिए देर से मैदान में उतारा। सवाल यह है कि क्या उनकी लोकप्रियता पार्टी को लाभ दिला पाएगी, या रणनीतिक चूक भारी पड़ेगी।
-देवेंद्र यादव-

देर से ही सही, आखिरकार असम चुनाव में निर्दलीय सांसद पप्पू यादव की ‘बुलेट’ कांग्रेस के पक्ष में 4 अप्रैल को डिब्रूगढ़ के तिनसुकिया विधानसभा क्षेत्र में प्रचार के लिए पहुंच ही गई। बिहार के पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने 4 अप्रैल को युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदयभान चीब के साथ कांग्रेस कार्यालय में प्रेस वार्ता की। इस दौरान उन्होंने पूर्वांचल क्षेत्र से असम में जाकर बसे लोगों से कांग्रेस के पक्ष में मतदान करने की अपील की। प्रेस वार्ता के बाद पप्पू यादव ने युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ बुलेट पर सवार होकर तिनसुकिया में मोटरसाइकिल रैली निकाली और कांग्रेस उम्मीदवार डेविड फूकन के पक्ष में मतदाताओं से समर्थन मांगा।
गांधी परिवार के प्रति समर्पित और बिहार के पूर्णिया लोकसभा क्षेत्र से सात बार निर्दलीय चुनाव जीतने वाले देश के पहले नेता पप्पू यादव, पूर्वांचल क्षेत्र में एक लोकप्रिय चेहरा हैं। इसका कारण यह है कि वे बिहार और पूर्वांचल के लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए संसद से लेकर सड़क तक लगातार संघर्ष करते नजर आते हैं।
2024 में सातवीं बार निर्दलीय के रूप में पूर्णिया लोकसभा क्षेत्र से जीत दर्ज करने वाले पप्पू यादव लगातार संसद से लेकर सड़क तक बिहार और पूर्वांचल के युवाओं और छात्रों की समस्याओं को लेकर सक्रिय रहे हैं।
बिहार के बदलते राजनीतिक परिदृश्य में छात्रों और युवाओं के बीच एक नई आशा के रूप में पप्पू यादव उभरते नजर आ रहे हैं। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि राज्य में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक दौर अब ढलान की ओर माना जा रहा है। ऐसे में पप्पू यादव जिस तरह से जनता के मुद्दों को लेकर सक्रिय हैं, उससे यह सवाल उठता है कि क्या बिहार की राजनीति का अगला दौर उनके नाम हो सकता है। उल्लेखनीय है कि अपने राजनीतिक जीवन में पप्पू यादव ने समय-समय पर नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव दोनों को राजनीतिक सहारा भी दिया था। आज जब दोनों नेताओं की राजनीति कमजोर होती दिख रही है, तो पप्पू यादव की संभावनाएं चर्चा में हैं।
हालांकि, सवाल असम विधानसभा चुनाव को लेकर भी है। कांग्रेस के चुनावी रणनीतिकारों ने पप्पू यादव को देर से ही सही, लेकिन 4 अप्रैल को प्रचार के लिए बुलाया। यदि उन्हें पहले सक्रिय किया जाता, खासकर तब जब झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने असम की 21 सीटों पर चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था, तो स्थिति कुछ अलग हो सकती थी। उस समय उम्मीदवार चयन में पप्पू यादव से चर्चा की जाती, तो कांग्रेस को उन सीटों पर बेहतर विकल्प मिल सकते थे, जहां झारखंड मुक्ति मोर्चा के उम्मीदवार मैदान में हैं।
फिलहाल, पप्पू यादव असम में कांग्रेस के पक्ष में प्रचार कर रहे हैं, लेकिन इसका चुनावी परिणाम क्या होगा, यह आने वाला समय ही बताएगा।
एक और बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस असम में भी अपनी पुरानी गलतियों को दोहरा रही है? बड़ी संख्या में बाहरी और अवसरवादी नेताओं की मौजूदगी के कारण स्थानीय कार्यकर्ता और प्रत्याशी असमंजस की स्थिति में नजर आ रहे हैं। पार्टी में ‘फोटोबाज’ नेताओं की भरमार दिखाई दे रही है, जो सोशल मीडिया पर अपनी नियुक्तियों को प्रचारित करने में अधिक व्यस्त हैं, बजाय पार्टी के प्रचार के।
यही प्रवृत्ति अक्सर कांग्रेस की हार का कारण बनती रही है। ऐसे में पार्टी को इससे बचना चाहिए था, लेकिन सवाल यही है कि कांग्रेस को समझाए कौन? अंततः, हार की असल वजह वही पुरानी दिखाई देती है। पप्पू यादव जैसे प्रभावशाली नेता को देर से बुलाना और अनावश्यक नेताओं की भीड़ इकट्ठा करना।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

















