
असम में कांग्रेस के पक्ष में बनता हुआ चुनावी माहौल क्या दिल्ली दरबार की दखल से बिगड़ रहा है? स्थानीय नेतृत्व बनाम बाहरी रणनीति के बीच फंसी कांग्रेस की चुनावी दिशा पर उठते अहम सवाल।
-देवेंद्र यादव-

क्या असम में कांग्रेस जीतने जा रही है? क्या असम की सत्ता में कांग्रेस वापसी करेगी? और कांग्रेस जीती हुई बाजी को कैसे हारती है, आज इन सवालों पर चर्चा कर रहा हूं।
असम में विधानसभा चुनाव हैं और कांग्रेस द्वारा क्षेत्रीय दलों से गठबंधन तथा अपने प्रत्याशियों की घोषणा के बाद चुनावी माहौल उसके पक्ष में बनता हुआ नजर आ रहा था। ऐसा लग रहा था कि असम विधानसभा चुनाव की कमान असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष गौरव गोगोई के हाथों में राहुल गांधी ने सौंप दी है। गौरव गोगोई के नेतृत्व में स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की टीम कांग्रेस को एक बार फिर सत्ता में लाने के लिए जुट गई थी। इसी कारण कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनता हुआ दिखाई दे रहा था।
लेकिन जैसे ही कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनने लगा, वैसे-वैसे दिल्ली दरबारी नेताओं की फौज असम में जुटने लगी। बड़ी संख्या में बाहरी नेताओं ने स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं की जगह ले ली। ऐसा कांग्रेस में पहली बार नहीं हो रहा है। राज्यों के विधानसभा चुनावों में अक्सर देखा गया है कि जब दिल्ली दरबार को लगता है कि कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है, तब वे चुनावी राज्यों में जाकर डेरा डाल लेते हैं और स्थानीय नेतृत्व को किनारे कर यह जताने की कोशिश करते हैं कि सरकार बनने में उनका बड़ा योगदान होगा। इसी गलतफहमी में कांग्रेस कई बार जीती हुई बाजी हार जाती है।
मैंने पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव की घोषणा से पहले अपने ब्लॉग में लिखा था कि यदि राहुल गांधी बेहतर प्रदर्शन या जीत चाहते हैं, तो उन्हें दरबारी नेताओं को चुनावी राज्यों में जाने से रोकना चाहिए और स्थानीय नेताओं व कार्यकर्ताओं पर अंत तक भरोसा करना चाहिए। असम में शुरुआत में ऐसा ही लगता था कि कांग्रेस स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा कर रही है, लेकिन जैसे ही माहौल पक्ष में बना, दिल्ली दरबार सक्रिय हो गया।
अब सवाल उठता है, क्या कांग्रेस असम में सत्ता में वापसी करेगी या फिर अपनी पुरानी गलतियों का खामियाजा यहां भी भुगतेगी? एक और सवाल यह है कि क्या राहुल गांधी स्थानीय नेताओं और दिल्ली दरबारी नेताओं के बीच फंस गए हैं, या उन्हें जानबूझकर भटकाया जा रहा है? क्या वे अपने ट्रैक से उतर रहे हैं, या उन्हें उतारा जा रहा है?
यह भी समझना जरूरी है कि असम की सत्ता से कांग्रेस को बाहर किसने किया—भारतीय जनता पार्टी ने या हेमंत बिस्वा शर्मा ने? 2001 से 2015 तक कांग्रेस तरुण गोगोई के नेतृत्व में लगातार 15 साल सत्ता में रही। 2016 में भारतीय जनता पार्टी ने सरकार बनाई और उसके बाद से अब तक सत्ता में है। 2021 में भाजपा ने फिर जीत हासिल की और हेमंत बिस्वा शर्मा मुख्यमंत्री बने।
स्पष्ट है कि कांग्रेस को सत्ता से बाहर भाजपा ने किया था, इसलिए रणनीति और प्रचार भी भाजपा के खिलाफ होना चाहिए। लेकिन कांग्रेस के नेता भाजपा के बजाय मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा शर्मा को केंद्र में रखकर प्रचार कर रहे हैं। सवाल यह है कि इससे कांग्रेस को फायदा होगा या नुकसान?
बड़ा सवाल यह भी है कि राहुल गांधी अभी तक यह क्यों नहीं समझ पाए हैं कि उन्हें सही रास्ते से भटकाने वाले रणनीतिकार कौन हैं? यदि कांग्रेस ने शुरुआत में गौरव गोगोई के नेतृत्व में जो अभियान शुरू किया था, उसे अंत तक जारी रखा होता और दिल्ली दरबार के नेताओं का जमावड़ा नहीं होता, तो चुनाव का परिदृश्य कुछ और ही होता।
अब देखना होगा कि असम विधानसभा चुनाव के परिणाम क्या आते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं।)

















