
-डॉ.सुरेश पाण्डेय-
विश्वभर के चिकित्साकर्मी, नर्सिंग एवं पेरामेडिकल स्टॉफ विगत ढाई वर्षों से कोविड-19 नामक अदृश्य शत्रु से मुकाबला कर रहे हैं। भारत में 2500 से अधिक चिकित्सक एवं अनेको पेरामेडिकल स्टॉफ, नर्सिंगकर्मी कोविड-19 से संघर्ष करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे चुके हैं। पिछ्ले दिनों दौसा की महिला चिकित्सक डॉ अर्चना शर्मा द्वारा की गई आत्म हत्या, सवाई मानसिंह मेडिकल कॉलेज, जयपुर में कार्य कर रही मेडिसिन की रेजिडेन्ट डॉ.अनु अग्रवाल द्वारा सुसाइड मीडिया में सुर्खियां बना था। इससे पहले केरल के आर्थोपेडिक सर्जन डॉ.अनुप कृष्णा द्वारा की गई आत्महत्या भी सुर्खियां बना था । इन समाचारों ने चिकित्सकों मे व्याप्त आत्महत्या की समस्या के बारे में नयी बहस छेडी है।
मेडिकल प्रोफेशन एवं आत्महत्या-
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अमेरिका में प्रतिदिन एक चिकित्सक आत्महत्या कर लेता है। हर वर्ष अमेरिका में लगभग 400 डॉक्टर्स आत्महत्या कर लेते हैं। महिला चिकित्सकों को पुरुषों की तुलना में आत्महत्या का प्रयास करने का अधिक जोखिम होता है। डॉक्टरों में आत्महत्या एक ‘पब्लिक हेल्थ क्राइसिसÓ मानी गई है। मेडिकल प्रोफेशन से जुडे जितने भी चिकित्सक आत्महत्या करते है उनमें सबसे अधिक संख्या साईक्रेट्री एवं अनेस्थेसिया के डॉक्टर्स की होती है।चिकित्सा क्षेत्र एवं मेडिकल प्रोफेशन को ज्यादातर वही लोग चुनते है जो एक व्यक्ति के तौर पर अधिक संवेदन शील होते है। यह एक अच्छा चिकित्सक होने के लिए एक नैसर्गिंक गुण भी है। क्योकि आप दूसरे की पीड़ा को दूर करने में भावनात्मक सहायता तभी कर सकते है जब आप उस दर्द की पीड़ा को समझते हो। मेडिकल प्रोफेशन में काम के बढते दबाव व लंबी ड्यूटी घंटे- होने के कारण सबसे ज्यादा आत्महत्या की घटनाएं रेजिडेन्ट डॉक्टर्स में पाई जाती है। रेजिडेंट डॉक्टर्स व्यस्त मेडिकल कॉलेज अस्पतालों की जिम्मेदारी उठाने की अहम कड़ी होते हैं जहां ये सीनियर प्रोफेसर के मार्ग दर्शन में अनवरत कार्य करते हैं। मेडिकल कालेज अस्पतालों के इमरजेंसी विभागों में पोस्टेड कई रेजिडेन्ट डॉक्टर्स 24 घंटे नहीं बल्कि 48 घंटे या उससे भी अधिक समय गंभीर एवं मरणासन रोगियों को बचाने में लगा देते है। सप्ताह भर में बिना ब्रेक लिए 80 घंटे से भी अधिक काम करना रेजिडेन्ट चिकित्सकों के लिए कोई नई बात नहीं है। लंबे समय तक बिना ब्रेक लिए, ब्रेड, बिस्किट खाकर, आधी अधूरी नींद लेकर अस्पतालों में गंभीर बीमारियों से पीडि़त रोगियों के लिए डयूटी देना मानसिक क्षेत्र में भारी तनाव उत्पन्न करते है, जो गंभीर अवसाद या कभी कभी आत्महत्या का कारण बन सकते है।
क्यो बढ रही है रेजिडेन्ट डॉक्टर्स में आत्महत्या?
मेडिकल कालेज अस्पताल में रोगियों के अत्यधिक क्लीनिकल कार्यभार के बीच रेजिडेन्ट्स चिकित्सकों को पोस्ट ग्रेजुएट परीक्षा की तैयारी करने, पढने, थीसिस (शोध) लिखने और सेमिनार या अन्य एकेडमिक एक्टिविटीज के लिए प्रजेंटेशन बनाने के लिए समय निकालना मुश्किल हो जाता है। सरकारी अस्पतालों में नर्सिंग एवं अन्य सहायक स्टाफ की कमी के चलते रेजिडेन्ट डॉक्टरों को रोगियों के खून के नमूने निकालने से लेकर, स्ट्रेचर खींचने, सेम्पल की रिपोर्ट लेकर आने आदि काम भी नियमित रूप से करने पड सकते है। उचित सुरक्षाकर्मियों के अभाव में उन्हें गंभीर रूप से पीडि़त रोगियों की जान नहीं बचा पाने पर उनके परिजनों द्वारा हिंसा, अपमान एवं मारपीट आदि घटनाओं का शिकार भी होना पडता है।
कोविड-19 वैश्विक महामारी एवं चिकित्सा व्यवस्था
कोविड 19 वैश्विक महामारी ने हाइजिन, हैल्थ बजट, हॉस्पिटल एवं हेल्थकेयर पॉलिसी पर सभी का ध्यान आकर्षित किया है। भारत में चिकित्सा सुविधाओं को दिया जाने वाला कम बजट (जी.डी.पी. का लगभग 1 प्रतिशत), मेडिकल कॉलेज/सरकारी अस्पतालों में मरीजों का निरंतर बढता दबाव, चिकित्सा सुविधाओं का अभाव एवं चिकित्सकों के प्रति रोगियों एवं उनके परिजनों द्वारा किया गया हिंसक व्यवहार आदि घटनाएं रेजिडेन्ट चिकित्सकों के मन: क्षेत्र में भारी तनाव उत्पन्न करती हंै जो निराशा, अवसाद एवं मायूसी को जन्म देती है। कोविड-19 वैश्विक महामारी के दौरान पी.पी.ई. किट पहनकर बिना ब्रेक लिए ड्यूटी के लंबे घंटे एवं वैश्विक महामारी के कारण असमय संक्रमित होकर बीमार पडऩे के खतरों से उत्पन्न हुई निराशा के कारण भी रेजीेडेन्ट डॉक्टर्स में आत्महत्या की घटनाएं बढी है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा किए गए अध्ययन के अनुसार इस समय रेजिडेन्ट डॉक्टर्स में अवसाद एवं डिप्रेशन के अनेकों मामले सामने आए है।
समाधान: रेजिडेंट्स चिकित्सकों ने कैसे रूके आत्म हत्या ?
रेजिडेंट्स चिकित्सकों में आत्महत्या अवसाद निराशा को रोकने के लिए सरकार को हेल्थ पॉलिसी पर ध्यान देते हुए मेडिकल कॉलेज अस्पतालों का कायाकल्प करना होगा। कोविड-19 वैश्विक महामारी से सबक लेते हुए सरकार को अविलम्ब जी.डी.पी. का 3 से 5 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं में खर्च किया जाए। मेडिकल कॉलेज /सरकारी अस्पतालों की लचर व्यवस्थाओं को फिर से दुरस्त किया जाए। रेजिडेन्ट डॉक्टर्स की ड्यूटी के घंटे निर्धारित किए जाए। अस्पतालों में होने वाली तोड़-फोड़ एवं मरीजों अथवा तिमारदारों द्वारा रेजिडेंट्स चिकित्सकों के प्रति हिंसा, मारपीट की घटनाएं रोकने के लिए सख्त कानून बने एवं दोषियों को गैरजमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज कर सजा दी जाए, जिससे युवा चिकित्सकों का मनोबल नहीं टूटे । रेजिडेन्ट डॉक्टर्स की सभी समस्याओं के निराकरण और काउंसलिंग के लिए मेडिकल कॉलेज में पृथक अनुभाग होना चाहिए। राज्य व केन्द्र सरकारेें रेजीडेन्ट डॉक्टर्स की परिवेदनाओं के लिए इंटरनेट पर पोर्टल बना सकती है। रेजिडेन्ट का कार्यभार कम करके अस्पताल में तथा मेडिकल कॉलेज हॉस्टल में आधार भूत ढांचा उपलब्ध करवाकर रेजिडेन्ट डॉक्टर्स के पठन पाठन की उचित व्यवस्था करके उनकी समस्याओं के निराकरण पर ध्यान नहीं दिया तो रेजिडेन्ट डॉक्टरों की आत्महत्या का सिलसिला नही रूकेगा।
रेजिडेंट्स चिकित्सक सुसाइड देश के लिए अपूरणीय क्षति
एक एम बी बी एस चिकित्सक को तैयार करने में 6 वर्ष का समय लगता है। यदि स्पेशलाइजेशन अथवा सुपर – स्पेशलाइजेशन का समय भी जोड़ा जाए तो यह समय बढकर 9 से 12 वर्ष हो जाता है। कोविड-19 के चलते यदि एक भी चिकित्सक आत्महत्या करता है तो यह देश के लिए अपूरणीय क्षति है। आज जरूरत इस बात की है कि सरकार,स्वास्थ्य विभाग, नेशनल मेडिकल कमीशन, इण्डियन मेडिकल एसोसिएशन, एवं अन्य चिकित्सा संगठन युवा चिकित्सकों में बढ रही आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाएं जिससे इन घटनाओं की पुनर्रावति नहीं हो ।
-डॉ. सुरेश पाण्डेय-
वरिष्ठ नेत्र सर्जन, सुवि नेत्र चिकित्सालय एवं लेसिक लेजर सेंटर, कोटा (राज.)
लेखक, सीक्रट्स आफ सक्सेसफुल डॉक्टर्स,ए हिप्पोक्रेटिक आडिसी: लेसन्स फ्रॉम ए डॉक्टर कपल आन लाईफ इन मेडिसिन,चैंलेजेज, एण्ड डॉक्टरप्रन्र्योरशिप एवं एंटरप्रेन्योर्शिप फॉर डॉक्टर्स: हाउ टू स्टार्ट एंड बिल्ड सक्सेसफुल मेडिकल प्रैक्टिस।


















रेजिडेंट्स चिकित्सक युवा पीढ़ी के प्रतिनिधि होते हैं, इनके ऊपर काम का अधिक बोझ डालना अमानवीय एवं चिकित्सा जगत के लिए घातक भी है। यह युवा चिकित्सक जीवन की पहली पायदान पर ,मरीजों की चिकित्सा,सुश्रूषा,सेवा के लिए
तत्पर होते हैं, इनको मरीज के तीमारदारों द्वारा प्रताणित किया जाना,असहनीय होता है। इनके होस्टल भी सुविधाजनक नहीं पाए जाते हैं। युवा रेजिडेंट्स चिकित्सकों की हौसला अफजाई की जानी चाहिए। शासन, प्रशासन की ओर से समुचित सुरक्षा मुहैया करना अति आवश्यक है तभी हमारी युवा पीढ़ी के चिकित्सक चिकित्सक पूरी ऊर्जा के साथ रोगियों की सेवा कर पायेंगे।