लौटा कोटा के ऐतिहासिक दरवाजों का वैभव

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-ए एच जैदी-

ah zaidi
एएच जैदी

(नेचर एवं टूरिज्म प्रमोटर)
कोटा। चंबल नदी के तट पर बसे शहर कोटा की पहचान में यहां के कोट और दरवाजों की खास भूमिका रही है। इन दरवाजों की वजह से ही उक्त इलाके की पहचान भी थी। लेकिन वर्षों से अनदेखी और उपेक्षा की वजह से यह दरवाजे जीर्ण शीर्ण अवस्था में थे। वर्षों से इन्हें खोला और बंद नहीं किया जा रहा था। हालत यह थे कि लोगों ने इन्हें कचरा घर में तब्दील कर दिया था।

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यूडीएच मंत्री शांति धारीवाल ने कोटा को स्मार्ट सिटी बनाने का संकल्प लिया तो यहां के ऐतिहासिक दरवाजों की सुध ली गई। जहां एक ओर चंबल रिवर फ्रंट के निर्माण और चौराहों के सौंदर्यकरण का काम हाथ में लिया गया तो पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए यहां के उपेक्षित पडे ऐतिहासिक दरवाजों का पुराना वैभव बनाने का प्रयास किया गया। कोटा चेप्टर इंटेक के कन्वीनर निखिलेश सेठी ने जिला प्रशासन व पर्यटन की मीटिंग में शहर के पनाह के दरवाज़ों के मुद्दों को कई बार उठाया। उन्होंने यूडीएच मंत्री शांति धारीवाल से भी इस मुद्दे को लेकर बात की और सभी के समझ में यह आया कि पर्यटन के लिए शहर के पुराने वैभव को उभारना आवश्यक है। क्योंकि ये दरवाजे कोटा की एक पहचान हैं तो इनका पुनरुद्धार का कार्य किया जाना चाहिए।

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शहर के सभी दरवाजो को उसी रुप में वापस लाया गया जैसे हम रियासत काल के उस समय को याद कर रहे हों। कोचिंग सिटी के विकास कार्याे के साथ साथ विरासत विकास का भी ध्यान रखा तो लाडपुरा, पटनपोल, किशोर पुरा और सूरजपोल सभी दरवाजों की खूबसूरती में चार चांद लग गए। सूरज पोल दरवाज़े में ऊपर की ओर बेहतरीन फूल पत्तियों से अलंकरण किया। वहीं साइट की ऊपर की ओर शिकार पेंटिंग बनवाई। कोटा शैली शिकार पेंटिग के लिए विश्व प्रसिद्ध है।

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यहां बाहर एक मज़ार है तीन मंदिर भी हैं। इनमें दो अंदर एक बाहर स्थित है। बरसों से दरवाजे जाम थे जो अब खुलने और बन्द भी होते हैं। यहां छोटी खिड़कियां भी हैं जो दरवाजा बंद होने पर आने जाने में काम आती थी। ये आज भी वैसी दिखी जा सकती है। दरवाज़ों के ऊपर कोटा स्टेट की पारंपरिक वेश भूषा में दरबान बनाये गए हैं। दिन में जितना खूबसूरत लगरहा है उतना ही रात को भी लगेगा।

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सभी दरवाजों के निर्माण में पुरातत्व विभाग के मापदण्डों के अनुसार गुणवत्तापूर्ण सामग्री का उपयोग किया गया है।

 

 

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