
-चांद शेरी-

खूब इस शहर का भी मन्ज़र है
हाथ में हर किसी के पत्थर है
अक्से-आईना हर घड़ी हर पल
ज़िन्दगी का बदलता तेवर है
मीर-तुलसी-कबीर को पढ़िये
उनका अनमोल अक्षर-अक्षर है
पी गया विष जो दूसरों के लिए
भेष में आदमी के शंकर है
लब पे सहरा की प्यास है लेकिन
मेरी आँखों में इक समन्दर है
मिट रहे हैं घरोंदे बन-बन कर
रेत है और मेरा मुक़द्दर हैं
इन बहारों पे तू न जा ‘शेरी’
देख अंज़ाम इनका पतझर है
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