
कांग्रेस को यदि चुनाव में सफल होना है तो, चुनावी रणनीति चुनाव की घोषणा होने से 3 दिन पहले नहीं बल्कि, चुनाव की घोषणा होने कई महीने पहले से बनानी होगी और कांग्रेस के नेताओं को घर घर जाकर कांग्रेस की योजनाओं को बताना होगा, तभी कांग्रेस सफल होगी।
-देवेंद्र यादव-

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हाल ही में एक दिलचस्प दृश्य देखने को मिला। मौका था दलित नेता कांशी राम की जन्म शताब्दी का। मंच पर कांग्रेस के कई नेता मौजूद थे। लेकिन चर्चा का केंद्र बन गए दो नाम। राहुल गांधी और राजेन्द्र गौतम। कार्यक्रम में कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र गौतम ने खुलकर बात रखी। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के कई नेता आर्थिक रूप से मजबूत हो गए हैं। लेकिन इंडियन नेशनल कांग्रेस संगठन कमजोर हो गया है।
गौतम ने साफ कहा कि कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या यही है। नेता मालामाल हो गए। संगठन गरीब हो गया। उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस चुनाव के समय ही सक्रिय होती है। रणनीति भी चुनाव घोषणा के कुछ दिन पहले बनती है। यह तरीका अब नहीं चलेगा। पार्टी को महीनों पहले तैयारी करनी होगी। नेताओं को घर घर जाना होगा। लोगों से सीधे संवाद करना होगा।
मंच पर मौजूद राहुल गांधी ने भी इस बात से सहमति जताई। उन्होंने कहा कि सच यह है कि कांग्रेस गरीब हो गई है। लेकिन उन्होंने यह भी जोड़ा कि कांग्रेस का गरीब होना गलत नहीं है। क्योंकि कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का दिल अमीर है।
राहुल गांधी ने अपने कार्यकर्ताओं को “बब्बर शेर” कहा। उनका कहना था कि कांग्रेस की असली ताकत यही कार्यकर्ता हैं। लेकिन यहां एक बड़ा सवाल खड़ा होता है। क्या राहुल गांधी को अब समझ आ रहा है कि कांग्रेस कमजोर क्यों हुई। पार्टी के भीतर लंबे समय से ऐसे नेता मौजूद हैं जो जमीन की सच्चाई ऊपर तक नहीं पहुंचने देते। हाईकमान तक अक्सर यही संदेश जाता रहा कि सब ठीक है। जबकि चुनाव नतीजे कुछ और कहानी कहते रहे।
राजेंद्र गौतम की बात इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि उन्होंने मंच से खुलकर सच रखा। कांग्रेस में इस तरह की साफगोई कम ही देखने को मिलती है। गौतम ने अपने भाषण में कांशीराम का उदाहरण भी दिया। उन्होंने बताया कि कांशीराम ने बेहद साधारण जीवन जिया। कई बार सूखी रोटी खाकर भी अपना मिशन आगे बढ़ाया। लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया।
यह बात राहुल गांधी ने भी स्वीकार की। उनके बयान से यह संकेत मिला कि शायद वह संगठन में बदलाव की जरूरत को समझ रहे हैं। लेकिन असली सवाल अभी भी बाकी है। क्या कांग्रेस में बैठे पुराने और ताकतवर नेताओं को हटाना इतना आसान होगा। कई नेता वर्षों से संगठन और सत्ता में मजबूत पकड़ बनाए बैठे हैं। उनके पास संसाधन हैं। नेटवर्क है। ऐसे में बदलाव की राह आसान नहीं दिखती।
लखनऊ का यह कार्यक्रम कांग्रेस के लिए एक संकेत हो सकता है। शायद एक मोड़ भी।
जरूरत इस बात की है कि पार्टी फिर से जमीनी नेतृत्व तैयार करे। राहुल गांधी को अपना लीडरशिप डेवलपमेंट मिशन फिर से शुरू करना चाहिए। नए लोगों को आगे लाना होगा। कार्यकर्ताओं को संगठन में जगह देनी होगी।
अगर ऐसा होता है तो कांग्रेस की वापसी की राह बन सकती है। अन्यथा सवाल वही रहेगा। कांग्रेस कमजोर क्यों हुई।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















