
राजस्थान में 2028 के विधानसभा चुनाव को लेकर सियासी सरगर्मियां तेज हो रही हैं। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत की सक्रियता ने सत्ता के समीकरणों को फिर से उनके इर्द-गिर्द ला खड़ा किया है। सवाल यह है कि क्या इस बार भी सत्ता की चाबी इन्हीं दिग्गज नेताओं के हाथ में होगी, या बदलते राजनीतिक परिदृश्य में कोई नया नेतृत्व उभरेगा?
-देवेंद्र यादव-

क्या राजस्थान में 2028 के विधानसभा चुनाव में सत्ता पक्ष भाजपा की लगातार जीत और प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस की सत्ता में वापसी की चाबी राज्य के दो पूर्व मुख्यमंत्रियों—भाजपा की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्रीमती वसुंधरा राजे और कांग्रेस नेता, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत—के हाथ में है?
अनुभव और महत्वाकांक्षा का समीकरण
वसुंधरा राजे दो बार राजस्थान की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं, जबकि अशोक गहलोत तीन बार मुख्यमंत्री पद संभाल चुके हैं। दोनों नेताओं की राजनीतिक महत्वाकांक्षा अब भी कायम है—वसुंधरा तीसरी बार और गहलोत चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की इच्छा रखते हैं।
2028 की दिशा तय करेगा नेतृत्व?
भाजपा नेता वसुंधरा राजे और कांग्रेस नेता अशोक गहलोत की यह महत्वाकांक्षा ही तय करेगी कि भाजपा सत्ता में बनी रहती है या कांग्रेस वापसी कर पाती है। यही इस समय का सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल बन गया है।
सत्ता परिवर्तन की परंपरा और नया समीकरण
राजस्थान में भाजपा और कांग्रेस दो प्रमुख दल हैं, जो बारी-बारी से सत्ता में आते रहे हैं। लंबे समय से यहां कोई भी पार्टी स्थायी रूप से सत्ता में नहीं रह पाई है और आमतौर पर हर पांच साल में सत्ता परिवर्तन होता रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि 2028 में भी क्या यही परंपरा जारी रहेगी, या भाजपा अपनी सरकार बरकरार रख पाएगी?
यह काफी हद तक इन दोनों पूर्व मुख्यमंत्रियों पर निर्भर करता है, जो अभी भी मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार हैं। वसुंधरा और गहलोत ने अपनी-अपनी राजनीतिक सक्रियता बढ़ा दी है, जिससे चुनावी समीकरणों की आहट अभी से सुनाई देने लगी है।
हाईकमान की दुविधा और पीढ़ी परिवर्तन
दोनों नेताओं की सक्रियता ने भाजपा और कांग्रेस हाईकमान की चिंता बढ़ा दी है। एक ओर दोनों नेता उम्रदराज हो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर पार्टियां युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने की कोशिश में हैं।
2023 में भाजपा ने सत्ता में आने के बाद वसुंधरा राजे के बजाय भजनलाल शर्मा को मुख्यमंत्री बनाया। कांग्रेस में भी अशोक गहलोत के स्थान पर सचिन पायलट को मुख्यमंत्री बनाने की चर्चा रही, लेकिन कांग्रेस हाईकमान भाजपा की तरह निर्णायक कदम नहीं उठा सका और 2018 में गहलोत को ही मुख्यमंत्री बनाया गया।
लोकप्रियता बनाम संगठनात्मक कमजोरी
गहलोत और वसुंधरा दोनों ही अपनी-अपनी सरकारों की योजनाओं के कारण जनता के बीच लोकप्रिय हैं, लेकिन अपने-अपने संगठनों में अपेक्षाकृत कमजोर माने जाते हैं।
इसका एक कारण यह है कि लंबे समय तक मुख्यमंत्री पद पर रहने के चलते उन्होंने अपनी पार्टियों में दूसरे नेताओं को उभरने का पर्याप्त अवसर नहीं दिया। नतीजतन, दोनों ही दलों में मुख्यमंत्री पद के आकांक्षी नेताओं में असंतोष है, जो समय-समय पर सामने आता रहता है।
क्षेत्रीय दलों की बढ़ती चुनौती
अब सबकी नजर 2028 के विधानसभा चुनाव पर है। क्या कांग्रेस सत्ता में वापसी करेगी, या भाजपा अपनी पकड़ बनाए रखेगी? हालांकि राज्य में भाजपा और कांग्रेस अब भी दो प्रमुख और प्रभावशाली दल हैं, लेकिन क्षेत्रीय दल भी अपने-अपने क्षेत्रों में मजबूत होते नजर आ रहे हैं। यह स्थिति दोनों राष्ट्रीय दलों के लिए पूर्ण बहुमत हासिल करना कठिन बना सकती है और चुनावी नतीजों को और अधिक रोचक बना सकती है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















