
पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस इस बार पहले से अधिक संगठित और सतर्क नजर आ रही है। उम्मीदवार चयन से लेकर प्रचार रणनीति तक, पार्टी ने पुराने तरीकों से हटकर अधिक गोपनीय और ज़मीनी दृष्टिकोण अपनाया है। क्या यह बदली हुई रणनीति कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन में सकारात्मक बदलाव ला पाएगी?
-देवेंद्र यादव-

देश के पाँच राज्यों तमिलनाडु, केरल, पांडिचेरी, असम और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के नतीजे कांग्रेस के पक्ष में आएँ या न आएँ, यह अलग बात है। लेकिन 2014 के बाद पहली बार ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस किसी भी तरह के मुगालते में रहने के बजाय गंभीरता से रणनीति बनाकर चुनाव लड़ रही है।
2014 के बाद जितने भी राज्यों में विधानसभा चुनाव हुए, उनमें अक्सर कांग्रेस के नेता भ्रमित हो जाते थे। वे यह मान बैठते थे कि जनता सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ है और कांग्रेस को जिताना चाहती है। इसी भ्रम में स्थानीय छत्रप नेता मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर ख्याली पुलाव पकाने लगते थे। नतीजा यह होता था कि चुनावी फोकस विकास और मुद्दों से हटकर आपसी खींचतान और गुटबाज़ी पर आ जाता था। टिकटों की बंदरबांट और आपसी प्रतिस्पर्धा के कारण कई बार कांग्रेस जीती हुई बाज़ी भी हार जाती थी।
इस बार पाँच राज्यों के चुनावों में यह जरूर पता चला कि कांग्रेस ने प्रत्याशियों के चयन के लिए स्क्रीनिंग कमेटियाँ बनाई हैं, लेकिन यह साफ़ तौर पर सामने नहीं आया कि बैठकों में क्या हुआ और उम्मीदवारों के नाम कैसे तय किए गए। यह बदलाव अपने आप में महत्वपूर्ण है।
पहले के चुनावों में कांग्रेस काफी पहले से ही यह प्रचार करने लगती थी कि वह सर्वे करा रही है, पर्यवेक्षक भेज रही है और जीतने वाले उम्मीदवारों का चयन कर रही है। इससे कार्यकर्ताओं के बीच अफरा-तफरी का माहौल बन जाता था और भ्रम की स्थिति पैदा होती थी। कई बार टिकट बेचने जैसे आरोप भी सुनने को मिलते थे। इस बार ऐसा कुछ खास देखने को नहीं मिला, जो एक सकारात्मक संकेत माना जा सकता है।
मैंने अपने ब्लॉग के माध्यम से राहुल गांधी और कांग्रेस हाईकमान को कुछ सुझाव दिए थे, जैसे कि चुनावी रणनीति को सार्वजनिक न किया जाए, प्रत्याशियों के चयन में ज़मीनी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेतृत्व की राय को प्राथमिकता दी जाए, और चुनावी राज्यों में वार रूम जैसी व्यवस्थाओं से बचा जाए, क्योंकि वहीं से अक्सर रणनीति लीक हो जाती है और प्रतिद्वंद्वी सतर्क हो जाते हैं।
मेरा मानना रहा है कि जब स्क्रीनिंग कमेटी प्रत्याशियों का पैनल लेकर दिल्ली पहुँचे, तो राहुल गांधी को स्वयं उन नामों की समीक्षा करनी चाहिए और उनकी मौजूदगी में ही अंतिम घोषणा होनी चाहिए। संभव है कि इस बार कांग्रेस ने इसी तरह की प्रक्रिया अपनाई हो, इसलिए चुनाव प्रचार में शोर-शराबा कम और गंभीरता अधिक दिखाई दे रही है।
मैंने यह भी सुझाव दिया था कि दिल्ली के नेताओं की भीड़ चुनावी राज्यों में कम की जाए। अक्सर ऐसा देखा गया है कि बड़ी संख्या में नेता बिना ज़रूरत के वहाँ पहुँच जाते हैं और बयानबाज़ी करने लगते हैं। इससे स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं को उपेक्षित महसूस होता है, और पार्टी को फायदा कम, नुकसान ज्यादा होता है। बेहतर यही है कि स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा किया जाए।
बिहार विधानसभा चुनाव इसका बड़ा उदाहरण रहा है। वहाँ राहुल गांधी ने कांग्रेस को मजबूत करने के लिए रणनीति बनाई और खुद जमकर प्रचार भी किया, लेकिन दिल्ली से गए नेताओं के अत्यधिक दखल ने पूरी रणनीति को कमजोर कर दिया। टिकट वितरण को लेकर भी कई गंभीर आरोप लगे, और नतीजा यह हुआ कि कांग्रेस ने अपने इतिहास का बेहद खराब प्रदर्शन किया।
लगता है कि राहुल गांधी ने इन अनुभवों से सीख ली है। शायद इसी कारण इस बार स्क्रीनिंग कमेटियों और चुनावी जिम्मेदारियों में ऐसे नेताओं को आगे रखा गया है, जो कम बोलते हैं लेकिन रणनीति मजबूत बनाते हैं।
सचिन पायलट, डी.के. शिवकुमार और गुलाम अहमद मीर जैसे नेता अनुभवी और रणनीतिक सोच रखने वाले हैं। ये राहुल गांधी के भरोसेमंद सहयोगी भी हैं, और उन्हें उम्मीद है कि ये नेता कांग्रेस को बेहतर परिणाम दिलाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















