राजस्थानः भाजपा की चुनाव व्यूह रचना में जाटों पर खास नजर

जातीय हिसाब से देखें तो राजस्थान विधानसभा में जाट विधायकों का दबदबा रहा है और अब भी है। लेकिन अभी तक इस समुदाय का कोई नेता मुख्यमंत्री पद पर नहीं पहुंच पाया। पिछले महीनों में जाट समाज का जयपुर में सम्मेलन हुआ तो उसमें यह मांग जोरशोर से उठी कि राजस्थान में जाट मुख्यमंत्री बनना चाहिए। अब उनकी इस मांग पर कौनसी पार्टी गौर करती है यह तो अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन इस बात में कोई शक नहीं है कि राजस्थान में सत्ता की दावेदार दोनों ही पार्टियां भाजपा व कांग्रेस जाटों के सहारे चुनावी रण जीतना चाहती हैं।

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-कांग्रेस की पूर्व सांसद ज्योति मिर्धा को किया भाजपा में शामिल

-द ओपिनियन-

भाजपा राजस्थान को लेकर अपने सियासी समीकरण साधने में जुटी है और इसके लिए जाट नेताओं को अपने पाले में लाने की हरसंभव कोशिश कर रही है। शेखावाटी के प्रमुख जाट नेता सुभाष महरिया की पार्टी में वापसी कराने के बाद भाजपा एक और प्रमुख जाट नेता ज्योति मिर्धा को पार्टी में ले आई हैं। ज्योति मिर्धा दिग्गज जाट नेता नाथूराम मिर्धा की पौत्री हैं और उनका परम्परागत प्रभाव क्षेत्र नागौर जिला है। लेकिन शेखावाटी से लेकर मारवाड़ तक जाट बहुल सीटें हैं और वहां पर समीकरण जाट नेताओं के अनुसार ही बनते बिगड़ते रहे हैं। शेखावाटी से लेकर मारवाड़ तक कभी कांग्रेस के पास कई प्रभावशाली जाट नेता थे जिनमें नाथूराम मिर्धा, परसराम मदेरणा, शीशराम ओला, कुंभाराम आर्य जैसे नेता शामिल हैं। बाद में कुछ नेता कांग्रेस में रहे किसी ने पार्टी बदल ली, लेकिन अब राजनीति में उनकी अगली पीढ़ी है। हालांकि वह उनके जितने प्रभावशाली नहीं है। लेकिन वोटों का गणित उनके आसपास घूमता है, इसलिए इनके हर पार्टी अपने आप से जोड़े रखना चाहती है। भाजपा की चुनावी रणनीति में जाट अहम फैक्टर हैं और वह उन तक पहुंचने का भरसक प्रयास कर रही है। इसी के तहत उसने ज्योति मिर्धा को अंततः पार्टी में शामिल कर लिया। ज्योति कांग्रेस से सांसद रही हैं। 2009 में वह कांग्रेस के टिकट पर नागौर से निर्वाचित हुई थी। लेकिन नागौर में हनुमान बेनीवाल के नए जाट नेता के रूप में उभरकर सामने आने के बाद कांग्रेस का यहां जनाधार बंट गया। हनुमान बेनीवाल ने अपनी पार्टी बना ली। पिछले चुनाव में उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा था और सांसद बने लेकिन कृषि कानूनों को लेकर चले किसान आंदोलन के दौरान उनके व भाजपा के बीच दूरी बढ़ गई। इसलिए भाजपा नागौर में एक मजबूत जाट चेहरा चाहती है और इस रूप में उसे ज्योति मिर्धा का साथ मिल गया। ज्योति मिर्धा के साथ सवाई सिंह चौधरी भी भाजपा में शामिल हो गए। पूर्व पुलिस अधिकारी चौधरी 2018 के विधानसभा चुनाव में चुनाव मैदान में भाग्य आजमाया था, लेकिन वह विधानसभा में पहुंचने में विफल रहे। ज्योति मिर्धा व चौधरी को पार्टी में शामिल करने के पीछे भाजपा की मंशा यहां अपना जनाधार खड़ा करने की है जो उसके जीत की मंजिल तक ले जाए। नागौर का सियासी गणित अब ऐसा हो गया है कि कोई भी नेता अपने दम पर किसी को जीता नहीं सकता। सही समीकरण बनने पर ही जीत हासिल हो सकती है। ज्योति ने कांग्रेस में कार्यकर्ताओं की अनदेखी का आरोप लगाया और कहा कि वहां हो रही घुटन के कारण वे पाटी छोड़ रही हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में ज्योति कांग्रेस की प्रत्याशी थी, लेकिन उन्हें बेनीवाल के सामने हार का सामना करना पड़ा था। लेकिन ज्योति को इस बार भाजपा से लोकसभा चुनाव या विधानसभा चुनाव में टिकट मिलता है तो वहां न ज्योति की राह आसान होगी और न हनुमान बेनीवाल की या उनकी पार्टी की राह आसान होगी। भाजपा के प्रतिबध वोट प्लस अपने निजी वोट जीत का समीकरण बनाते हैं लेकिन निजी वोट का कार्ड किसका चलेगा अभी तय नहीं है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा शेखावाटी अंचल के प्रमुख जाट नेता हैं और पार्टी की कमान उनके हाथों में रहते एक जाट नेता का कांग्रेस को छोड़ कर जाना अखरता है। हालांकि डोटासरा ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया में मीडिया से यही बात कही कि वे पिछले वर्षों से पार्टी की बैठकों में नहीं आ रही थी। जो नेता जाता है, वह पार्टी में कोई ना कोई निकालता ही है।
जातीय हिसाब से देखें तो राजस्थान विधानसभा में जाट विधायकों का दबदबा रहा है और अब भी है। लेकिन अभी तक इस समुदाय का कोई नेता मुख्यमंत्री पद पर नहीं पहुंच पाया। पिछले महीनों में जाट समाज का जयपुर में सम्मेलन हुआ तो उसमें यह मांग जोरशोर से उठी कि राजस्थान में जाट मुख्यमंत्री बनना चाहिए। अब उनकी इस मांग पर कौनसी पार्टी गौर करती है यह तो अभी नहीं कहा जा सकता लेकिन इस बात में कोई शक नहीं है कि राजस्थान में सत्ता की दावेदार दोनों ही पार्टियां भाजपा व कांग्रेस जाटों के सहारे चुनावी रण जीतना चाहती हैं।

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