
अब नजर राजस्थान पर टिक गई है। यहां राज्यसभा की एक सीट पर कांग्रेस की जीत की संभावना है। इसलिए इस सीट का फैसला राजनीतिक संदेश भी देगा। सवाल यही है कि क्या यहां भी वही प्रयोग होगा जो दूसरे राज्यों में देखने को मिला है।
-देवेंद्र यादव-

कांग्रेस ने आने वाले राज्यसभा चुनाव के लिए अपने छह उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। नाम सामने आते ही पार्टी के भीतर हलचल भी तेज हो गई। कई बड़े नेता ऐसे थे जिन्हें उम्मीद थी कि इस बार हाईकमान उन पर भरोसा जताएगा। लेकिन सूची जारी होने के बाद उनकी उम्मीदें टूटती नजर आईं। शायद ऐसे नेता इन दिनों मन ही मन वही पुराना गीत गुनगुना रहे होंगे। हम वफा करके भी तन्हा रह गए। दिल के अरमां आंसुओं में बह गए।
लेकिन अगर कांग्रेस में वफादारी की बात करें तो तस्वीर कुछ और भी है। पार्टी में ऐसे हजारों कार्यकर्ता हैं जो पीढ़ियों से कांग्रेस के साथ खड़े हैं। उन्होंने न सत्ता देखी और न कोई बड़ा पद। फिर भी उनके चेहरे पर शिकायत कम ही दिखती है। उन्हें कभी तन्हाई में बैठकर यह गीत गुनगुनाते नहीं देखा गया। शायद यही लोग कांग्रेस की असली ताकत हैं। इन्हीं की वजह से मुश्किल दौर में भी पार्टी का ढांचा खड़ा हुआ है।
तन्हाई का एहसास दरअसल उन नेताओं को ज्यादा हो रहा है जो लंबे समय तक सत्ता और संगठन के मलाईदार पदों पर रहे। जिनकी राजनीति मजबूत कार्यकर्ताओं की नींव पर खड़ी रही। लेकिन समय के साथ कुछ नेताओं को यह भ्रम हो गया कि कांग्रेस उनसे है। वे कांग्रेस से नहीं हैं।
कहा जाता है कि कभी यह भ्रम गांधी परिवार तक भी पहुंच गया था। खासकर राहुल गांधी को भी एक समय तक यही लगा कि कांग्रेस की इमारत मजबूत कार्यकर्ताओं की नींव पर नहीं बल्कि कुछ बड़े नेताओं के पिलरों पर खड़ी है। इसी सोच के कारण लंबे समय तक पार्टी में नींव की जगह पिलरों को मजबूत करने की कोशिश होती रही। नतीजा यह हुआ कि नीचे की जमीन कमजोर होती चली गई।
लेकिन हालात बदले। जब राहुल गांधी भारत जोड़ो यात्रा पर निकले तो उन्हें जमीनी हकीकत करीब से देखने का मौका मिला। रास्ते में हजारों कार्यकर्ता बिना किसी स्वार्थ के उनके साथ चलते दिखे। गांव और कस्बों में ऐसे लोग मिले जो बिना पद के भी कांग्रेस को अपना मानते हैं। तब शायद उन्हें एहसास हुआ कि कांग्रेस की असली ताकत पिलर नहीं बल्कि नींव है। और यह नींव कार्यकर्ताओं से बनी है।
शायद यही वजह है कि अब राहुल गांधी संगठन की दिशा बदलने की कोशिश में दिख रहे हैं। वे मजबूत नींव पर नए पिलर खड़े करना चाहते हैं। राज्यसभा उम्मीदवारों के हालिया चयन को भी इसी नजर से देखा जा रहा है।
तमिलनाडु, छत्तीसगढ़, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने जिन छह नामों की घोषणा की है, उनमें कुछ ऐसे चेहरे भी हैं जो लंबे समय से संगठन से जुड़े रहे हैं। यही कारण है कि पार्टी के भीतर राहुल गांधी की रणनीति की चर्चा हो रही है। कई लोग इसे संगठन की नई सोच मान रहे हैं।
अब नजर राजस्थान पर टिक गई है। यहां राज्यसभा की एक सीट पर कांग्रेस की जीत की संभावना है। इसलिए इस सीट का फैसला राजनीतिक संदेश भी देगा। सवाल यही है कि क्या यहां भी वही प्रयोग होगा जो दूसरे राज्यों में देखने को मिला है।
क्या राजस्थान में भी किसी जमीनी कार्यकर्ता को मौका मिलेगा। या फिर एक बार फिर दिल्ली की राजनीति का कोई बड़ा नाम यहां से राज्यसभा भेजा जाएगा। यह भी चर्चा में है कि लंबे समय से राजस्थान से किसी मुस्लिम नेता को राज्यसभा नहीं भेजा गया है। ऐसे में यह भी देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस बार कांग्रेस इस दिशा में कोई नया कदम उठाती है।
राजस्थान की यह एक सीट छोटी जरूर है। लेकिन इसका संकेत बड़ा हो सकता है। इससे यह तय होगा कि राहुल गांधी अपनी नई रणनीति पर टिके रहते हैं या फिर पुरानी राजनीतिक मजबूरियां उन्हें रास्ता बदलने पर मजबूर कर देती हैं।
फिलहाल कांग्रेस के भीतर भी इंतजार है। और राजनीतिक गलियारों की नजर भी इसी फैसले पर टिकी हुई है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















