असम में कांग्रेस की नई रणनीति: ‘लोकल नेतृत्व’ पर दांव

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असम विधानसभा चुनाव 2026 में कांग्रेस ने अपनी पारंपरिक रणनीति से हटकर स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा जताया है। राष्ट्रीय नेताओं की सीमित भूमिका और प्रदेश नेताओं की बढ़ी सक्रियता इस बदलाव का संकेत देती है। राहुल गांधी का यह प्रयोग न केवल चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है, बल्कि भविष्य की राजनीति की दिशा भी तय कर सकता है।

-देवेन्द्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

असम चुनाव में कांग्रेस के कई राष्ट्रीय नेताओं की मौजूदगी के बावजूद, कांग्रेस हाईकमान ने प्रत्याशियों के चयन से लेकर प्रचार की बड़ी जिम्मेदारी स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं को देकर अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव किया है। 2014 के बाद देश के विभिन्न राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में प्रत्याशियों के चयन से लेकर प्रचार तक की कमान मुख्य रूप से राष्ट्रीय नेताओं के हाथ में रहती थी। लेकिन असम विधानसभा चुनाव 2026 में तस्वीर बदली हुई नजर आ रही है।

कांग्रेस की राष्ट्रीय महासचिव और स्क्रीनिंग कमेटी की अध्यक्ष श्रीमती प्रियंका गांधी मतदान की तारीख 9 अप्रैल से महज 9 दिन पहले, यानी 1 अप्रैल को पहली बार असम पहुंचीं और उन्होंने अपनी पहली चुनावी सभा की। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि कांग्रेस इस बार असम में स्थानीय कार्यकर्ताओं और नेताओं को राष्ट्रीय नेताओं से कहीं अधिक महत्व दे रही है। इससे पहले जब भी विधानसभा चुनाव होते थे, कांग्रेस के राष्ट्रीय नेता कई महीने पहले ही सक्रिय हो जाते थे। कई नेता तो चुनाव तक संबंधित राज्यों में स्थायी रूप से डेरा डाल लेते थे, और राहुल गांधी व प्रियंका गांधी की ताबड़तोड़ सभाएं और रोड शो लगातार चलते रहते थे।

लेकिन असम और केरल में, जहां 9 अप्रैल को मतदान होना है, वहां राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने अंतिम समय में प्रचार शुरू किया है।

अगर असम में कांग्रेस के राष्ट्रीय नेताओं की बात करें, तो कर्नाटक के उपमुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव भंवर जितेंद्र सिंह सक्रिय हैं। लेकिन जनता के बीच प्रचार में सबसे आगे असम कांग्रेस कमेटी के प्रदेश अध्यक्ष और युवा नेता गौरव गोगोई नजर आ रहे हैं। इससे साफ है कि राहुल गांधी ने असम में सत्ता में वापसी के लिए स्थानीय नेतृत्व पर भरोसा जताया है।

इस रणनीति के पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि राहुल गांधी स्वयं कई बार यह महसूस कर चुके हैं—और सार्वजनिक रूप से कह भी चुके हैं—कि जब राष्ट्रीय नेता दिल्ली से जाकर राज्यों में प्रचार करते हैं, तो उनकी सभाओं में भीड़ तो उमड़ती है, लेकिन वह वोट में तब्दील नहीं हो पाती। यही वजह रही कि कांग्रेस को कई चुनावों में हार का सामना करना पड़ा। शायद इसी अनुभव के आधार पर राहुल गांधी ने इस बार स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता देने का प्रयोग किया है।

यह प्रयोग पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में कितना सफल होगा, इसका पता तो परिणाम आने के बाद ही चलेगा। लेकिन यह तय है कि इस रणनीति का असर आने वाले 2029 के चुनावों में जरूर दिखाई दे सकता है। 2014 के बाद अक्सर यह देखा गया कि राष्ट्रीय नेताओं के अत्यधिक हस्तक्षेप के कारण स्थानीय कार्यकर्ता और नेता खुद को उपेक्षित महसूस करने लगते थे और निष्क्रिय हो जाते थे। यह स्थिति पार्टी के लिए नुकसानदायक साबित होती थी।

संभवतः इसी अनुभव से सीख लेते हुए राहुल गांधी ने पहली बार राष्ट्रीय नेताओं की ‘अतिरिक्त सक्रियता’ को सीमित किया है। इसका सकारात्मक असर यह हो सकता है कि स्थानीय नेतृत्व खुद को सशक्त महसूस करे और पूरी ऊर्जा के साथ चुनावी मैदान में उतरे। फिलहाल, कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता यह महसूस कर रहे हैं कि हाईकमान को उन पर भरोसा है और इसी भरोसे पर खरा उतरने के लिए वे पूरी ताकत से चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह उनके निजी विचार हैं।)

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