क्या गुलाम अहमद मीर भर पाएंगे गुलाम नबी आजाद की राजनीतिक कमी?

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गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस छोड़ने के बाद पार्टी में उनकी राजनीतिक कमी को भरना बड़ी चुनौती बन गई है। अब यह जिम्मेदारी गुलाम अहमद मीर के कंधों पर है, जिन्हें पश्चिम बंगाल जैसे कठिन राजनीतिक मैदान में कांग्रेस को फिर से खड़ा करने का अहम दायित्व मिला है। सवाल यही है कि क्या मीर, आजाद की तरह संकटमोचक बनकर पार्टी को मजबूती दे पाएंगे।

-देवेन्द्र यादव-

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देवेन्द्र यादव

क्या कांग्रेस नेता गुलाम अहमद मीर, कांग्रेस में गुलाम नबी आजाद की कमी को पूरा कर पाएंगे? गुलाम नबी आजाद कांग्रेस के बड़े नेता थे, जिन्होंने कांग्रेस को छोड़कर स्वयं का राजनीतिक दल बनाया, लेकिन वह अपने गृह राज्य जम्मू-कश्मीर में भी विधानसभा चुनाव में सफल नहीं हो पाए। गुलाम नबी आजाद कांग्रेस के भीतर भरोसेमंद नेता थे, लेकिन जब कांग्रेस के 2014 और उसके बाद बुरे दिन आए, तो उन्होंने कांग्रेस को छोड़कर अपना राजनीतिक दल बनाया।

सवाल यह है कि क्या गुलाम अहमद मीर, जो गुलाम नबी आजाद की तरह जम्मू-कश्मीर से आते हैं और बड़े नेता हैं, कांग्रेस के भीतर उनकी राजनीतिक कमी को पूरा कर पाएंगे?

गुलाम अहमद मीर, जम्मू-कश्मीर कांग्रेस कमेटी के 2015 से 2022 तक प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं और कश्मीर घाटी के डुरु विधानसभा क्षेत्र से कई बार विधायक भी रह चुके हैं। वर्तमान में भी वह विधायक हैं।

गुलाम अहमद मीर गांधी परिवार के बेहद करीबी हैं। गुलाम मीर, अमेठी से सांसद किशोरी लाल शर्मा के साथ लंबे समय तक रायबरेली और अमेठी लोकसभा क्षेत्रों में पार्टी के लिए काम करते रहे हैं।

गुलाम नबी आजाद के कांग्रेस को अलविदा कहने के बाद, राहुल गांधी ने गुलाम अहमद मीर को कांग्रेस का राष्ट्रीय महासचिव बनाया और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य का राष्ट्रीय प्रभारी नियुक्त किया। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस लंबे समय से सत्ता से बाहर है। कांग्रेस को लंबे समय तक पश्चिम बंगाल की सत्ता से बाहर करने वाली नेता ममता बनर्जी थीं, जिन्होंने कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया और लगातार तीसरी बार राज्य में अपनी सरकार बनाई।

गुलाम अहमद मीर के सामने सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम बंगाल से ही शुरू होती है, जहां कांग्रेस के पास 243 विधायकों में से एक भी विधायक नहीं है। एक समय था जब पश्चिम बंगाल में कांग्रेस सत्ता में हुआ करती थी, लेकिन आज वहां उसके पास मजबूत कैडर भी नहीं है। जबकि एक समय ऐसा भी था जब पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के पास प्रणब मुखर्जी और प्रिया रंजन दास मुंशी जैसे बड़े नेता हुआ करते थे।

राहुल गांधी ने पश्चिम बंगाल में अपने बेहद करीबी नेता गुलाम अहमद मीर को 2026 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मजबूत करने और बेहतर प्रदर्शन की जिम्मेदारी दी है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने के बाद शायद यह पहला चुनाव है, जब कांग्रेस अपने दम पर सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है। कांग्रेस हाईकमान के इस फैसले से आम कार्यकर्ता खुश नजर आ रहा है, क्योंकि लंबे समय से कार्यकर्ता चाहते थे कि पार्टी अपने दम पर चुनाव लड़े। जीत-हार तो होती रहती है, लेकिन इससे कार्यकर्ताओं का मनोबल बना रहता है।

कांग्रेस ने गठबंधन की राजनीति कर अपने कैडर को या तो खत्म किया या कमजोर किया। विभिन्न राज्यों में क्षेत्रीय दल कांग्रेस से समझौता कर स्वयं मजबूत हुए और कांग्रेस उन राज्यों में या तो खत्म हो गई या कमजोर हो गई। पश्चिम बंगाल इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। अब इसी पश्चिम बंगाल में अपनी खोई हुई जमीन वापस लाने के लिए कांग्रेस लंबे समय बाद सभी 243 विधानसभा क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार उतारने जा रही है। इसकी जिम्मेदारी पश्चिम बंगाल कांग्रेस कमेटी के राष्ट्रीय प्रभारी गुलाम अहमद मीर के हाथ में है। यही उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती है कि वह गुलाम नबी आजाद की कमी को पूरा कर पाएंगे या नहीं। क्योंकि संकट की घड़ी में गुलाम नबी आजाद कांग्रेस को उभारने का काम करते थे। अब राहुल गांधी ने यह जिम्मेदारी गुलाम अहमद मीर को दी है कि वह पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को मजबूत करें।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

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