वसुंधरा राजे की शंभूपुरा में सभा
-पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ईआरसीपी) मसले पर आखिर चुप्पी तोड़ी पूर्व मुख्यमंत्री ने लेकिन केंद्र सरकार के बजाय राजस्थान की अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार पर ही बरसी
-कृष्ण बलदेव हाडा –

पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ईआरसीपी) मसले पर रविवार को कोटा में एक जनसभा में पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने अपनी चुप्पी तोड़ी लेकिन वे केंद्र की जगह राज्य सरकार को ही कोस गई और श्रीमती राजे इसका कोई स्पष्ट कारण भी नहीं बता पाई।
राज्य की पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे ने रविवार को कोटा के नजदीक शंभूपुरा में आयोजित रैली को संबोधित करते हुए यह आरोप जड़ा कि पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ईआरसीपी) के मसले पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की सरकार के राजनीति करने के कारण यह परियोजना उलझ कर रह गई। इस पर अभी तक अमल नहीं किया जा रहा है जबकि यह जगजाहिर सी बात है कि इस मसले पर राजनीति प्रदेश सरकार नहीं बल्कि केंद्र सरकार के मुखिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार के जल संसाधन मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत कर रहे हैं जिन्होंने पिछले विधानसभा चुनाव में प्रदेश में कांग्रेस की सरकार के सत्ता में आने के बाद इस परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिलवाने के मामले में अभी तक सिर्फ और सिर्फ कोताही ही बरती है। जबकि खुद प्रधानमंत्री ने पिछले विधानसभा चुनाव से पहले अजमेर ग्रामीण और जयपुर में आयोजित जनसभाओं में यह घोषणा की थी कि विधानसभा चुनाव के बाद राजस्थान के 13 जिलों के लिए महत्वपूर्ण इस परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिया जाएगा। लेकिन जब विधानसभा चुनाव में प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी हार गई एवं श्रीमती वसुंधरा राजे को सत्ता गंवानी पड़ी और उनके स्थान पर तीसरी बार अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह वायदा न केवल चुनावी बल्कि अन्य वायदों की तरह एक जुमला भर साबित होकर रह गए और आज तक यह परियोजना राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा पाने के लिए तरस रही जबकि मुख्यमंत्री लगातार केंद्र सरकार से इस परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा देने की मांग करते आ रहे हैं। उन्होंने वित्त मंत्री के रूप में विधानसभा में पेश किए जाने वाले बजट में इस परियोजना के लिए वित्तीय प्रावधान तक किये है।
केंद्र सरकार की ओर से इस परियोजना के नाम पर राज्य को धेला भी नहीं दिया जा रहा है जो कि पूर्वी राजस्थान के उन 13 जिलों के हजारों किसान परिवारों के लाखों सदस्यों के लिए संकट-चिंता का विषय है क्योंकि इस परियोजना के अमल में लाए जाने के बाद वे सिंचाई एवं पेयजल की दृष्टि से लाभान्वित होने की उम्मीद लगाए हैं जिनमें हाडोती संभाग के चारों जिलों कोटा, बूंदी, बारां और झालावाड़ भी शामिल है जिन्हें इस परियोजना का लाभ मिलना प्रस्तावित है।
पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती राजे कोटा में कह गई कि उनके ही शासनकाल के दौरान पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना को मंजूरी दी गयी लेकिन अशोक गहलोत के राजनीति करने के कारण इस पर अमल नहीं हो पा रहा लेकिन उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि इस परियोजना को आगे बढ़ाने में बाधक कौन से तत्व बने हैं क्योंकि राज्य सरकार तो लगातार इस परियोजना के लिए बजट में प्रावधान कर रही है और केंद्र सरकार के मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक से इस बारे में विशेष रूप से आग्रह किया जा रहा है कि वह इस परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दें लेकिन केंद्र के स्तर पर न केवल इसकी अवहेलना की जा रही है। बल्कि जिस जल संसाधन मंत्रालय के पास इस परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना का दर्जा दिलवाने में अहम भूमिका निभानी चाहिए,उसके मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत राजस्थान के जोधपुर से निर्वाचित प्रतिनिधि होने के बावजूद अभी तक एक बार भी प्रधानमंत्री और केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष इस मसले को मजबूती से रख पाने में विफल साबित हुए है। श्री शेखावत तो इस मसले पर बातचीत करने के लिए भी तैयार नहीं है और हाल ही में भरतपुर में उनका यह कथन कि-“राजस्थान में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनवा दो,नहर परियोजना को 46 हजार करोड़ रुपए की मदद दिलवा देंगे” वायरल होने के बाद केंद्र सरकार की नीतियों की अच्छी-खासी फजीहत हो रही है। गजेंद्र सिंह शेखावत के इस बयान से यह स्पष्ट हो गया है कि केंद्र सरकार पक्षपात की राजनीति के तहत इस नहर परियोजना को राष्ट्रीय परियोजना के रूप में मंजूरी नहीं दे रही और यह पक्षपात राज्य सरकार के प्रति तो है ही लेकिन साथ ही श्रीमती राजे स्वयं इस राजनीति का शिकार हो रही है क्योंकि इस परियोजना को उस समय मंजूरी दी गई थी जब वह राजस्थान की मुख्यमंत्री थी और यह तो जगजाहिर है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का उनके प्रति कितना सकारात्मक रवैया है? भले ही गृह मंत्री अमित शाह अपने से पहले उदयपुर में उनका भाषण करवा ले या प्रधानमंत्री उनके साथ मंच साझा कर ले लेकिन असल में वे नरेंद्र मोदी की ‘गुड़ बुक’ में इतनी सहजता से आ नहीं सकती।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तंभकार हैं। यह लेखक के निजी विचार हैं)

















