
दिल्ली में “रन फॉर अंबेडकर, रन फॉर संविधान” केवल एक दौड़ नहीं थी, यह कांग्रेस की सामाजिक-राजनीतिक रणनीति का संकेत भी थी। सवाल है, क्या यह ऊर्जा सत्ता तक पहुंच पाएगी या फिर पुराने समीकरण ही हावी रहेंगे?
-देवेन्द्र यादव-

कांग्रेस के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने 2022 में दलित नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को कांग्रेस का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर, कांग्रेस को केंद्र की सत्ता में वापस लाने की जो फसल उगाई थी, क्या उस फसल को काटने का समय आ गया है? इसकी झलक 12 अप्रैल, रविवार को देश की राजधानी दिल्ली में सूर्य की पहली किरण के साथ देखने को मिली, जब देश के कोने-कोने से आए दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग के कांग्रेस कार्यकर्ता हजारों की संख्या में एकजुट होकर, कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र गौतम के साथ, राहुल गांधी की अगुवाई में रन फॉर अंबेडकर, रन फॉर संविधान — इस प्रथम दौड़ में दौड़ते नजर आए।
दलितों की दौड़ कांग्रेस के लिए शुभ संकेत
पहली बार हजारों की संख्या में दलितों को अपने हक और अधिकार की रक्षा के लिए राजधानी दिल्ली में दौड़ लगाते देखा गया। यह भविष्य में कांग्रेस के लिए एक अच्छा संकेत है, वहीं सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के लिए यह विचारणीय पहलू भी है। कांग्रेस इसलिए कमजोर हुई क्योंकि उसका पारंपरिक मतदाता — दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक — उससे दूर हो गया। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या कांग्रेस का यह पारंपरिक मतदाता भारतीय जनता पार्टी में स्थानांतरित हो गया, और इसी कारण भाजपा लगातार सत्ता में बनी है जबकि कांग्रेस कमजोर पड़ती जा रही है?
1977 से आज तक: कांग्रेस के घाव का इतिहास
यदि इसका सही आकलन किया जाए तो 1977 का वह युग सामने आता है, जब कांग्रेस के मजबूत दलित नेता बाबू जगजीवन राम सहित अनेक दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के नेताओं ने कांग्रेस छोड़कर अपने-अपने राजनीतिक दल बनाए और जनता पार्टी के गठबंधन में कांग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया। 1980 में श्रीमती इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी तो की, किंतु अपने पारंपरिक मतदाताओं को पूरी तरह वापस नहीं ला सकी। देश के विभिन्न राज्यों में कांग्रेस विचारधारा के दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के नेताओं ने अपने-अपने राज्यों में राजनीतिक दल बनाए और उत्तर प्रदेश व बिहार जैसे बड़े राज्यों में अपनी सरकारें गठित कीं।
कांग्रेस ने अपने पारंपरिक मतदाताओं को वापस लाने के प्रयास भी किए। इसी क्रम में 1980 में श्रीमती इंदिरा गांधी ने राजस्थान में दलित नेता जगन्नाथ पहाड़िया को मुख्यमंत्री बनाया। इसके अलावा कांग्रेस ने समय-समय पर सुशील कुमार शिंदे (महाराष्ट्र), अशोक गहलोत (राजस्थान), अजीत जोगी (छत्तीसगढ़), भूपेश बघेल (छत्तीसगढ़) और चरणजीत सिंह चन्नी (पंजाब) को मुख्यमंत्री पद सौंपा। बूटा सिंह और सुशील कुमार शिंदे को देश का गृहमंत्री बनाया गया, श्रीमती मीरा कुमार को लोकसभा अध्यक्ष का पद मिला और के. आर. नारायणन को पहले उपराष्ट्रपति और बाद में राष्ट्रपति बनाया गया। इन सब प्रयासों के बावजूद कांग्रेस वह घाव नहीं भर सकी, जो उसे दलित, आदिवासी और पिछड़ी जाति के नेताओं द्वारा अपने-अपने राज्यों में अलग राजनीतिक संगठन बनाने से हुआ था।
भाजपा की सफलता का रहस्य
भारतीय जनता पार्टी लगातार केंद्र की सत्ता में इसलिए काबिज है क्योंकि उसके रणनीतिकारों ने दलित, आदिवासी और पिछड़ी जाति के क्षेत्रीय दलों की शक्ति को समझा और कांग्रेस के पारंपरिक मतदाताओं को कांग्रेस की ओर लौटने से रोके रखा।
राजेंद्र गौतम की रणनीति और बड़ा सवाल
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या कांग्रेस, राहुल गांधी के नेतृत्व में, मल्लिकार्जुन खड़गे की अध्यक्षता में और कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र गौतम की राजनीतिक रणनीति के बल पर अपने पारंपरिक मतदाताओं को वापस लाकर सत्ता में वापसी कर पाएगी? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि 12 अप्रैल की मैराथन दौड़ में एक विरोधाभास भी स्पष्ट नजर आया। दौड़ में दलित, आदिवासी, पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक वर्ग के नेता बड़ी संख्या में उपस्थित थे, किंतु कांग्रेस के अगड़ी जातियों के वरिष्ठ नेता इस दौड़ में नजर नहीं आए। राहुल गांधी को इस पर गंभीरता से चिंतन और मंथन करना होगा, क्योंकि यही वह कारण है जिसकी वजह से कांग्रेस का पारंपरिक मतदाता कांग्रेस से दूर हुआ और वापसी नहीं कर रहा।
दौड़ोगे नहीं तो जीतोगे नहीं
कांग्रेस नेता राहुल गांधी और कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र गौतम का संदेश स्पष्ट है — “दौड़ोगे नहीं तो जीतोगे नहीं, जोड़ोगे तो जीतोगे।” महत्वपूर्ण यह है कि राहुल गांधी और राजेंद्र गौतम ने यह संदेश देने से पहले इसे स्वयं आत्मसात किया है।
: नई उम्मीद, बड़ी चुनौती
कांग्रेस में बड़े रणनीतिकारों की कमी लंबे समय से महसूस की जा रही थी। राजेंद्र गौतम को अनुसूचित जाति विभाग का अध्यक्ष बने अभी कुछ ही महीने हुए हैं, लेकिन इस अल्प समय में ही उन्होंने राहुल गांधी के सामने एक ठोस रणनीति प्रस्तुत की है कि कांग्रेस केंद्र की सत्ता में वापसी कैसे करे।
अब सवाल विश्वास का है, राहुल गांधी और कांग्रेस हाईकमान राजेंद्र गौतम की इस रणनीति पर कितना भरोसा कर पाते हैं? हालांकि राजेंद्र गौतम को यह पद सौंपना स्वयं में राहुल गांधी के दृढ़ विश्वास का प्रमाण है।
राजेंद्र गौतम के सामने चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सबसे बड़ी चुनौती दलित, आदिवासी और पिछड़ा वर्ग के क्षेत्रीय राजनीतिक दलों से कांग्रेस के पारंपरिक मतदाताओं को वापस लाने की है। इसके अतिरिक्त कांग्रेस के भीतर कुंडली मारकर बैठे स्वार्थी तत्वों से भी जूझना होगा।
इन चुनौतियों का सामना कैसे होगा, कांग्रेस का पारंपरिक मतदाता वापस लौटेगा या नहीं और कांग्रेस केंद्र की सत्ता में आएगी या नहीं, इसका उत्तर समय देगा। फिलहाल प्रतीक्षा और निगरानी दोनों जरूरी हैं।

















